एक विचार और समाजिक चेतना का क्रांति उदय

“जब तक हमारे समाज के विधायक और सांसद अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता छोड़कर केवल दलों के आदेशों का पालन करते रहेंगे, तब तक समाज के हितों की वास्तविक लड़ाई नहीं लड़ पाएंगे। जो नेतृत्व स्वयं निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है, वह समाज को दिशा भी नहीं दे सकता। दुखद यह है कि बंधी हुई सोच अक्सर वैसा ही नेतृत्व चुनती है, जो सवाल कम और समर्थन अधिक करता है।”
“क्या समाज का उत्थान उन जनप्रतिनिधियों के भरोसे संभव है, जो अपने समाज की अपेक्षा राजनीतिक आकाओं के प्रति अधिक जवाबदेह हों? जब आवाज़ समाज की हो और निर्णय कहीं और से तय हों, तब प्रतिनिधित्व का अर्थ क्या रह जाता है?”
“जब समाज का प्रतिनिधि समाज की नहीं, सत्ता की भाषा बोलने लगे, तब सम्मान, अधिकार और भागीदारी केवल नारों में सिमट कर रह जाती है।”
“समाज को ऐसे जनप्रतिनिधि नहीं चाहिए जो केवल कुर्सी बचाने की राजनीति करें, बल्कि ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो समाज का सिर ऊँचा रखने का साहस रखता हो।”


