“क्या बेमेतरा में जनप्रतिनिधियों की बात भी नहीं सुनता प्रशासन? विधायक के निर्देश के बाद भी नलकूप अनुमति लंबित, वार्ड पंच ने लगाया SDM पर फाइल फेंकने का आरोप”….

बेमेतरा – छत्तीसगढ़ सरकार जहां “सुशासन तिहार” के माध्यम से आम जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान करने का दावा कर रही है, वहीं बेमेतरा जिले से सामने आया एक मामला प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ग्राम पेंडी के एक निर्वाचित वार्ड पंच ने मुख्यमंत्री के नाम शिकायत प्रस्तुत कर आरोप लगाया है कि पेयजल संकट से जुड़े नलकूप खनन अनुमति प्रकरण को एक माह तक अधिकारियों द्वारा दबाकर रखा गया और स्थानीय विधायक के निर्देशों के बाद भी कार्रवाई नहीं की गई।
शिकायतकर्ता जयकरण पिता दाऊराम, वार्ड पंच ग्राम पेंडी ने आरोप लगाया है कि उन्होंने खसरा नंबर 511 की भूमि पर घरेलू पेयजल हेतु नलकूप खनन की अनुमति के लिए 30 अप्रैल 2026 को आवेदन दिया था, लेकिन अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कार्यालय एवं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) द्वारा मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया।
विधायक के निर्देश के बाद भी क्यों नहीं निकला आदेश?
शिकायत के अनुसार 22 मई को आयोजित सुशासन तिहार शिविर में जब उन्होंने अपनी समस्या क्षेत्रीय विधायक के समक्ष रखी, तब विधायक ने मौके पर ही संबंधित अधिकारियों को अनुमति जारी करने के निर्देश दिए थे। बड़ा सवाल यह है कि यदि जनप्रतिनिधि के निर्देश के बाद भी आदेश जारी नहीं हुआ तो आखिर प्रशासन किसके निर्देश पर काम कर रहा है?
क्या जिले में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की बातों को भी अनदेखा किया जा रहा है? या फिर प्रशासनिक तंत्र स्वयं को जनप्रतिनिधियों से ऊपर समझने लगा है?
वार्ड पंच के साथ दुर्व्यवहार का आरोप
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि 29 मई को आवेदन की प्रगति जानने पहुंचे तो संबंधित अधिकारी ने उनके साथ अमर्यादित व्यवहार किया तथा आवेदन पत्र उठाकर उनकी ओर फेंक दिया। यदि यह आरोप सही है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के साथ ऐसा व्यवहार करने का अधिकार किसी अधिकारी को है?
क्या यह प्रशासनिक अहंकार का उदाहरण नहीं माना जाएगा?
मुख्यमंत्री के दौरे से पहले अचानक सक्रिय क्यों हुआ PHE विभाग?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह बताया जा रहा है कि एक माह तक फाइल आगे नहीं बढ़ी, लेकिन मुख्यमंत्री के बेमेतरा आगमन की सूचना के बाद 30 मई को PHE विभाग के अधिकारी अचानक स्थल निरीक्षण करने पहुंच गए।
अब सवाल यह उठ रहा है कि—
यदि निरीक्षण संभव था तो एक माह पहले क्यों नहीं किया गया?
क्या मुख्यमंत्री के दौरे के डर से प्रशासन सक्रिय हुआ?
क्या सुशासन तिहार की शिकायतों का समाधान केवल वीआईपी दौरे के समय ही होता है?
आखिर आम नागरिक को अपनी समस्या के समाधान के लिए मुख्यमंत्री तक शिकायत पहुंचाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
सत्ता पक्ष के लिए भी चुनौती
यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं दिखता बल्कि सत्ता पक्ष के लिए भी असहज स्थिति उत्पन्न कर रहा है। जब स्वयं सत्तारूढ़ दल के विधायक के निर्देशों का पालन नहीं हो रहा, तब विपक्ष द्वारा लगाए जाने वाले “अफसरशाही हावी है” जैसे आरोपों को बल मिल सकता है।
जनता के बीच यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि यदि एक निर्वाचित वार्ड पंच और विधायक के निर्देशों की ऐसी स्थिति है, तो सामान्य ग्रामीणों की शिकायतों का क्या हाल होगा?
मुख्यमंत्री से कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री से तत्काल नलकूप खनन अनुमति जारी कराने, मामले की निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
अब निगाहें मुख्यमंत्री के बेमेतरा प्रवास पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि सुशासन के दावों के बीच उठे इन गंभीर सवालों का जवाब प्रशासन देता है या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।


