रेस्ट हाउस के पीछे कटते रहे अर्जुन के पेड़, भंडारित होती रही लकड़ियां… आखिर वन संपदा की सुरक्षा का जिम्मा किसका?..

*हसौद की शासकीय भूमि पर भारी मात्रा में लकड़ी भंडारण की चर्चा, जिम्मेदार तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर उठ रहे सवाल..*
छत्तीसगढ सक्ती – ग्राम पंचायत हसौद में शासकीय रेस्ट हाउस के पीछे कथित रूप से अर्जुन सहित अन्य वन प्रजातियों की लकड़ियों का बड़े पैमाने पर भंडारण होने की चर्चा ने वन संरक्षण व्यवस्था को लेकर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि क्षेत्र में लंबे समय से पेड़ों की कटाई और लकड़ी भंडारण की गतिविधियां संचालित हो रही थीं, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसकी निगरानी और रोकथाम की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? स्थानीय लोगों के बीच चर्चा है कि शासकीय भूमि के समीप बड़ी मात्रा में लकड़ी एकत्रित की गई है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वन संपदा की सुरक्षा के लिए नियुक्त अमला, गश्ती व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारी आखिर कहां थे? क्या संबंधित क्षेत्र में नियमित निरीक्षण नहीं किया गया, या फिर किसी स्तर पर सूचना के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी?
सरई, सागौन और अर्जुन जैसे बहुमूल्य वृक्षों की सुरक्षा का दायित्व किसका?
वन विभाग का मूल दायित्व जंगलों, वृक्षों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करना है। ऐसे में यदि शासकीय भूमि के आसपास पेड़ों की कटाई और लकड़ी भंडारण जैसी गतिविधियों की चर्चा सामने आ रही है, तो यह प्रश्न भी उठ रहा है कि सरई, सागौन, अर्जुन और अन्य बहुमूल्य वन संपदाओं की रक्षा का वास्तविक जिम्मेदार कौन है?
क्या संबंधित वन परिक्षेत्र में नियमित निगरानी की व्यवस्था प्रभावी है?
क्या क्षेत्रीय अमले द्वारा समय-समय पर निरीक्षण किया गया?
यदि गतिविधियां लंबे समय से चल रही थीं तो इसकी जानकारी विभाग तक क्यों नहीं पहुंची?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया है?
वन संपदा की सुरक्षा के लिए बनाए गए तंत्र की जवाबदेही आखिर किस स्तर पर तय होगी?
ग्रामीणों में चर्चा, जवाब का इंतजार
क्षेत्रवासियों का कहना है कि यदि वन संपदा को नुकसान पहुंचा है तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके। लोगों का मानना है कि केवल कार्रवाई की घोषणा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय होना भी जरूरी है, जिससे भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
सबसे बड़ा सवाल
जब वनों की रक्षा के लिए पूरा विभाग, अमला और निगरानी तंत्र मौजूद है, तब शासकीय भूमि के आसपास कथित रूप से इतनी बड़ी गतिविधियां कैसे संचालित होती रहीं?
क्या यह केवल निगरानी की कमी है या फिर व्यवस्था के किसी स्तर पर गंभीर चूक हुई है?
फिलहाल क्षेत्र की नजर इस बात पर टिकी है कि संबंधित विभाग मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करता है या नहीं। यदि कहीं अनियमितता पाई जाती है, तो जिम्मेदारी तय कर वन संपदा की सुरक्षा के प्रति जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।


