नवागढ़ विधानसभा में कर्जमाफी घोटाले की आशंका..!
सेवा सहकारी समितियों में आखिर क्या छुपाया जा रहा है..?

छत्तीसगढ़ के नवागढ़ विधानसभा क्षेत्र की दर्जनों सेवा सहकारी समितियाँ इन दिनों सवालों के घेरे में हैं। किसानों के कर्जमाफी को सरकार ने बड़ी उपलब्धि बताते हुए त्योहार की तरह प्रचारित किया, लेकिन अब उसी कर्जमाफी के आंकड़ों और प्रमाण पत्रों को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसानों की कर्जमाफी का पूरा डाटा आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया..? यदि सब कुछ नियम अनुसार हुआ, तो पत्रकारों और किसानों से जानकारी छुपाने की जरूरत क्यों पड़ रही है..?
सूत्रों के अनुसार कई समितियों में ऐसे किसानों को भी “कर्जमाफी प्रमाण पत्र” जारी कर दिए गए, जिनकी वास्तविक ऋण राशि से कहीं अधिक रकम माफ दर्शाई गई। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर यह गड़बड़ी कैसे हुई..? क्या यह महज तकनीकी त्रुटि है या फिर लाखों रुपये के फर्जीवाड़े की परतें धीरे-धीरे खुल रही हैं..?
डाटा मांगने पर जवाब देने से क्यों बच रहे कर्मचारी..?
स्थानीय पत्रकारों द्वारा जब सेवा सहकारी समितियों से किसानों की कर्जमाफी से संबंधित सूची, ऋण रजिस्टर, माफी की राशि और पात्र किसानों का डाटा मांगा जा रहा है, तब कई समिति प्रबंधक और कर्मचारी जानकारी देने से बचते नजर आ रहे हैं। कहीं “ऊपर से आदेश नहीं है” कहा जा रहा है, तो कहीं रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की बात कही जा रही है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि जब सरकार ने किसानों के हित में योजना लागू की थी, तब उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में डर कैसा..? आखिर कौन-सी ऐसी जानकारी है जिसे छुपाने की कोशिश की जा रही है..?
क्या किसानों और सरकार दोनों को रखा गया अंधेरे में..?
जानकारों का मानना है कि यदि कर्जमाफी की राशि में गड़बड़ी हुई है, तो यह केवल किसानों के साथ ही नहीं बल्कि राज्य सरकार के साथ भी बड़ा धोखा हो सकता है।
कई समितियों में यह चर्चा तेज है कि पात्रता से अधिक राशि दर्शाकर शासन को गलत डाटा भेजा गया। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आर्थिक अनियमितता और भ्रष्टाचार की श्रेणी में आ सकता है।
जिम्मेदारी किसकी..?
कर्जमाफी प्रक्रिया के दौरान केवल समिति प्रबंधक ही नहीं, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े अधिकारी, सहकारिता विभाग, लेखा परीक्षण तंत्र और निगरानी करने वाले जिम्मेदार विभाग भी सवालों के घेरे में आ गए हैं।
यदि किसी किसान का वास्तविक कर्ज कुछ और था और प्रमाण पत्र में माफी राशि कुछ और दर्ज हो गई, तो क्या बिना जांच के प्रमाण पत्र बांटे गए..? क्या सत्यापन प्रक्रिया केवल कागजों में पूरी कर दी गई..?
जांच की उठने लगी मांग
क्षेत्र में अब यह मांग तेज हो रही है कि राज्य सरकार इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराए। सामाजिक संगठनों और पत्रकारों द्वारा लिखित शिकायत तैयार कर संबंधित विभागों को भेजने की बात कही जा रही है। साथ ही मांग की जा रही है कि –
सभी सेवा सहकारी समितियों का कर्जमाफी डाटा सार्वजनिक किया जाए।
किसानों के वास्तविक ऋण और माफी राशि का मिलान कराया जाए।
दोषी अधिकारियों, समिति प्रबंधकों और संबंधित कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई हो।
जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर किसानों को सच्चाई बताई जाए।
सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम…
यदि सब कुछ पारदर्शी और नियम अनुसार हुआ है, तो फिर डाटा दिखाने में इतना डर क्यों..?
पत्रकारों के सवालों से समिति प्रबंधकों के पसीने क्यों छूट रहे हैं..?
और आखिर ऐसी कौन-सी सच्चाई है, जिसे दबाने की कोशिश की जा रही है..?
अब देखना होगा कि राज्य सरकार इस मामले को गंभीरता से लेकर निष्पक्ष जांच कराती है या फिर किसानों के नाम पर हुए कथित खेल की फाइलें दफ्तरों में ही दबकर रह जाएंगी।


