“हर गांव में शराब की बोतलें… और सरकार ढूंढ रही सुशासन !”
नवागढ़ विधानसभा में ‘मंदहा सदन’ की मांग ने खोली जमीनी हकीकत

नवागढ़ विधानसभा क्षेत्र में सुशासन के दावों की पोल अब खुद गांवों की तस्वीर खोलने लगी है। गांव-गांव में विकास के पोस्टर जरूर दिख रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चौक-चौराहे शराब की खाली बोतलों और डिस्पोजल कचरे से पटे पड़े हैं।
इसी बदहाल स्थिति को लेकर आवेदक पवन सांडे ने सुशासन तिहार में सरकार और जिला प्रशासन के सामने तीखी मांग रखते हुए कहा है कि यदि प्रशासन गांवों को शराब और गंदगी से बचाना चाहता है, तो हर गांव में “मंदहा सदन” बनाया जाए, ताकि ग्रामीणों को सामाजिक बैठकों और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए व्यवस्थित स्थान मिल सके।
सवाल यह उठ रहा है कि जब गांवों में शराब की बोतलें खुलेआम बिखरी पड़ी हैं, सार्वजनिक स्थान गंदगी से भर चुके हैं, तब जिला प्रशासन आखिर कर क्या रहा है..?
क्या प्रशासन को सिर्फ कार्यक्रमों में मंच सजाने से मतलब है या गांवों की असली हालत देखने की भी फुर्सत है..?
ग्रामीणों का आरोप है कि गांवों में सामाजिक व्यवस्था कमजोर होती जा रही है। जहां पहले चौपालों में सामाजिक चर्चा होती थी, वहां अब शराबखोरी और अव्यवस्था का माहौल बनता जा रहा है। खाली बोतलें और प्लास्टिक डिस्पोजल गांवों की पहचान बनते जा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी आंख बंद किए बैठे हैं।
“सुशासन तिहार” में जब जनता अपनी पीड़ा लेकर पहुंच रही है, तब यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर वर्षों से गांवों में सामाजिक भवनों और सामुदायिक व्यवस्था पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया..?
क्या सरकार सिर्फ योजनाओं के विज्ञापन तक सीमित है..?
पवन सांडे ने मांग करते हुए कहा कि हर गांव में मंदहा सदन बनने से ग्रामीणों को एक सामाजिक केंद्र मिलेगा, जहां बैठकी, पारंपरिक आयोजन और सामाजिक चर्चा हो सकेगी। इससे गांवों में भटकाव कम होगा और सार्वजनिक स्थलों पर फैल रही गंदगी पर भी नियंत्रण लग सकेगा।
“जब गांव की चौपालें कमजोर पड़ती हैं, तब शराब की बोतलें गांव की पहचान बन जाती हैं…”
अब बड़ा सवाल यही है कि जिला प्रशासन इस मांग को गंभीरता से लेगा या फिर बाकी शिकायतों की तरह इसे भी फाइलों में दबा दिया जाएगा। क्योंकि गांव पूछ रहा है —
“सुशासन आखिर जमीन पर है कहां..?”


