सेवा सहकारी समितियों का समस्याओं की अम्बार और प्रशासन देखकर कर रहा अनदेखा…
रात दिन एक करके समितियों के कम्प्यूटर आपरेटर व दैनिक कर्मचारियों ने समर्थन मुल्य पर बखुबी से कर रही ईमानदारी से खरीदी, किंतु समस्याओं से जूझ रहे कर्मचारियों की सुध लेने वाले कोई नहीं
द राम भक्त बेमेतरा – जिले में सेवा सहकारी समितियों की हालत आज किसी से छुपी नहीं है। समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान का समय पर उठाव न होना अब सिर्फ एक तकनीकी समस्या नहीं रही, यह प्रशासनिक संवेदनहीनता की तस्वीर बन चुकी है। मई का महीना समाप्ति की ओर है, लेकिन अब तक कई समितियों से धान का उठाव नहीं हो सका। नतीजा? खुले में पड़ा धान बारिश, आंधी-तूफान और चूहों का निवाला बन रहा है।
समितियों को लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी या तो कुंभकर्णीय नींद में हैं या अनदेखी की नीति पर चल रहे हैं।
प्रशासन की ओर से उल्टे समितियों पर दबाव बनाया जा रहा है कि “शॉर्टेज जीरो” होनी चाहिए। सवाल यह है कि जब धान उठेगा ही नहीं, जब नुकसान होगा ही – तो यह चमत्कार समिति कैसे करेगी? क्या जादू से धान को सुरक्षित रखा जाएगा?
नोडल अधिकारी, मार्केटिंग प्रभारी, खाद्य अधिकारी – ये सभी जवाबदेह पदों पर बैठे हैं, लेकिन जवाब किसी के पास नहीं। ऊपर से बनाई गई धान उपार्जन नीतियों का ज़मीनी स्तर पर पालन न होना बताता है कि योजनाएं सिर्फ कागजों में हैं, धरातल पर नहीं।
सेवा सहकारी समितियां, जो किसानों और शासन के बीच की कड़ी होती हैं, आज खुद उपेक्षा की शिकार हैं।
समितियों के कर्मचारियों को 50% लेने का वादा किया था अब उससे भी मुकरते नजर आ रहे हैं,आज व्यापम के तहत् बिठाया जा रहा समितियों पर कर्मचारी जिसे समितियों की ए बी सी डी तक नहीं आता जो व्यापम से कर्मचारी आऐंगे वह भी पहले कार्यरत कर्मचारियों से सिखेगे फिर उसी का आला अधिकारी बनकर उनपर शासन कसेगा इसे कहते हैं अंधेरे नगरी चौपट राजा
सरकार अगर वाकई किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भलाई चाहती है तो उसे सबसे पहले इन समितियों की पीड़ा को समझना होगा नहीं तो वो दिन दूर नहीं की समिति पूरी तरह डूब जाएगा और किसान फिर से सेठ-साहूकारों के दरवाजे भीख की रहम मांगेंगे…
सरकार की योजनाएं सिर्फ कागजों में ही दिखाई दे रहा हैं, धरातल पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा ।
यह सिर्फ धान खरीदी का सवाल नहीं है, यह जवाबदेही का सवाल है। और जवाबदेही तय करनी होगी चाहे वह अधिकारी हों या नीति निर्माता। अब बारी प्रशासन की है – जागे, या जनता के विश्वास को पूरी तरह खो दे। और सेठ साहूकार के कर्ज में डूबो दे … आपका क्या विचार है हमें जरूर व्यक्त करें ताकि उचित सुधार कर सकें और शासन प्रशासन को समिति कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान निकाला जा सके।


