जब अस्पताल में इलाज की जगह सौदे होने लगें, तो सबसे बड़ा खतरा बीमारी नहीं, व्यवस्था बन जाती है…

बेमेतरा – बेमेतरा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच के दौरान डॉक्टर नहीं, फार्मासिस्ट नहीं, और एक्सपायरी एम्पूल मिलने की बात सामने आई। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने गंभीर सवालों के बाद भी कार्रवाई की रफ्तार क्यों थम गई?
क्या गरीबों की जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि नियम-कानून भी पैसों के बोझ तले दब जाएं? आखिर किसके संरक्षण में जनता की सेहत से खिलवाड़ करने वालों के हौसले बुलंद हैं?
जिस अस्पताल में इलाज के नाम पर भरोसा दिया जाता है, अगर वहीं नियमों की धज्जियां उड़ती मिलें, तो जिम्मेदारी किसकी है? उन अधिकारियों की, जिनके कंधों पर निगरानी की जिम्मेदारी है, या उन लोगों की जो हर बार सच पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं?
आज सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं है… सवाल उस मां का है जो अपने बच्चे को लेकर अस्पताल पहुंचती है, उस किसान का है जो अपनी जमा पूंजी इलाज में लगा देता है, और उस गरीब परिवार का है जो डॉक्टर को भगवान मानकर अस्पताल का दरवाजा खटखटाता है।
जनता पूछ रही है—जांच में कमियां मिलीं तो कार्रवाई कहां है? और अगर कोई कमी नहीं थी, तो जब्ती और सवाल क्यों उठे?
“याद रखिए… जनता की अदालत में देर हो सकती है, लेकिन फैसला जरूर होता है।”


