श्मशान भूमि पर चली प्रशासन की कार्रवाई, हादसे का शिकार होते-होते बचा चैन माउंटी चालक
श्मशान भूमि पर बने व्यावसायिक परिसर को तोड़ने पहुंची प्रशासनिक टीम, चालक ने कूदकर बचाई जान

नवागढ़। नवागढ़ मुख्यालय स्थित तहसील कार्यालय के समीप ग्राम छीतापार में श्मशान भूमि पर बने कथित व्यावसायिक निर्माण को हटाने पहुंची प्रशासनिक टीम की कार्रवाई के दौरान बड़ा हादसा होते-होते टल गया। बेदखली और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई में लगे चैन माउंटी (जेसीबी) चालक को अपनी जान बचाने के लिए वाहन से छलांग लगानी पड़ी, जिससे उसके पैर में मोच आने की जानकारी सामने आई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, श्मशान भूमि पर अवैध खरीदी-बिक्री और उसके बाद किए गए व्यावसायिक निर्माण को लेकर प्रशासन द्वारा कार्रवाई की जा रही थी। इसी क्रम में ध्वस्तीकरण के लिए भारी मशीनरी मौके पर पहुंची थी। कार्रवाई के दौरान अचानक उत्पन्न हुई स्थिति में चालक ने तत्परता दिखाते हुए वाहन से छलांग लगाकर स्वयं को सुरक्षित किया।
मौके पर सुबह से ही पुलिस प्रशासन और राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारी बड़ी संख्या में तैनात रहे। क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई और पूरे घटनाक्रम पर प्रशासन की पैनी नजर बनी रही। कार्रवाई के चलते नवागढ़ विधानसभा क्षेत्र में एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
हाईकोर्ट के आदेश से जुड़ा है मामला
मामले में एक नया मोड़ तब आया जब 8 जून 2026 को पारित आदेश में बिलासपुर हाईकोर्ट ने संबंधित भूमि के रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। आदेश के अनुसार, खसरा नंबर 109 से संबंधित समस्त अभिलेख, जिनमें मिशल 1928-29, विस्तार पत्रक 1985-86, मिसल 1954-55 सहित मूल रिकॉर्ड शामिल हैं, राज्य सरकार को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है।
न्यायालय ने आगामी 18 जून तक सभी मूल दस्तावेज और अभिलेख जमा करने का निर्देश दिया है, ताकि भूमि की वास्तविक स्थिति और स्वामित्व का परीक्षण किया जा सके।
मुआवजे का भी उल्लेख
न्यायालय के आदेश में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि जांच और अभिलेखों के परीक्षण के बाद संबंधित भूमि पर पूर्व भूमि स्वामियों के दस्तावेज वैध पाए जाते हैं, तो याचिकाकर्ताओं राजकुमार साहू, विकास सोनी और धनेश घृतलहरे को नियमानुसार मुआवजा प्रदान किया जा सकता है।
बड़ा सवाल
श्मशान भूमि के रूप में दर्ज भूमि पर आखिर खरीदी-बिक्री और व्यावसायिक निर्माण कैसे हुआ? यदि भूमि सार्वजनिक उपयोग की थी, तो निर्माण की अनुमति किस आधार पर मिली? और यदि स्वामित्व संबंधी दावे वैध हैं, तो वर्षों तक रिकॉर्ड की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की गई?
इन सवालों के जवाब अब न्यायालय में प्रस्तुत होने वाले मूल अभिलेखों और प्रशासनिक जांच से सामने आने की उम्मीद है। फिलहाल नवागढ़ का यह मामला क्षेत्र की राजनीति, प्रशासनिक कार्यप्रणाली और भूमि प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।


