क्या आज भी जाति-द्वेष लोकतंत्र पर भारी पड़ रहा है? आखिर अपने ही लोग सम्मान से क्यों वंचित रह जाते हैं?…

बेमेतरा – क्या संविधान द्वारा समानता का अधिकार दिए जाने के बाद भी समाज के अनेक वर्ग आज जातीय भेदभाव, उपेक्षा और मानसिक प्रताड़ना का दंश झेलने को मजबूर हैं? क्या सत्ता बदलने से व्यवस्था बदल जाती है, या फिर जातिगत पूर्वाग्रह आज भी विभिन्न क्षेत्रों में अपनी जड़ें जमाए हुए हैं?
देश में समय-समय पर सामाजिक न्याय, समान अवसर और समरसता की बातें होती हैं। सत्ता चाहे किसी भी दल की रही हो, लेकिन यह प्रश्न लगातार उठता रहा है कि आखिर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समाज से जुड़े अनेक लोगों को पद और प्रतिष्ठा मिलने के बाद भी सम्मान और समान भागीदारी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है?
क्या अपने ही समाज के लोग निर्णय प्रक्रिया से दूर कर दिए जाते हैं?
क्या यह विडंबना नहीं है कि कई बार समाज के प्रतिनिधि महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचने के बाद अपने ही समाज के योग्य और संघर्षशील लोगों को पर्याप्त अवसर नहीं दे पाते? क्या प्रभावशाली पदों और जिम्मेदारियों पर ऐसे लोगों का वर्चस्व बढ़ जाता है, जो सामाजिक सरोकारों से अधिक व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता देते हैं?
यह भी चर्चा का विषय है कि क्या समाज के भीतर विभाजन पैदा कर, लोगों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की प्रवृत्ति आज भी सक्रिय है? यदि ऐसा है तो इसका लाभ आखिर किसे मिलता है और नुकसान किसका होता है?
पत्रकारिता में भी क्या जातिगत पूर्वाग्रह मौजूद हैं?
देश का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता क्षेत्र में भी समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या सभी पत्रकारों को समान अवसर और सम्मान मिल रहा है? क्या कुछ पत्रकारों को उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण उपेक्षा, भेदभाव या अविश्वास का सामना करना पड़ता है?
यदि लोकतंत्र का प्रहरी ही पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होगा, तो सामाजिक न्याय और निष्पक्षता की उम्मीद कैसे मजबूत होगी?
क्या जाति के नाम पर प्रतिभाओं का दमन समाज को कमजोर नहीं कर रहा?
जब किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी योग्यता, कार्यक्षमता और ईमानदारी के बजाय उसकी जाति के आधार पर किया जाता है, तब क्या समाज अपनी ही प्रतिभाओं को कमजोर नहीं कर देता? क्या यह स्थिति सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती नहीं है?
आखिर कब खत्म होगी ईर्ष्या, द्वेष और सामाजिक विभाजन की राजनीति?
क्या समाज को बांटकर राजनीति करने वालों की पहचान जरूरी नहीं है?
क्या अपने ही लोगों को आपस में लड़ाने वाली मानसिकता पर खुली बहस नहीं होनी चाहिए?
क्या जनप्रतिनिधियों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और सम्मान पहुंचाने की जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए?
क्या अब समय नहीं आ गया है कि जाति के बजाय योग्यता, मानवता और सामाजिक सद्भाव को प्राथमिकता दी जाए?
नई क्रांति का सवाल
आज आवश्यकता किसी एक वर्ग, दल या व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज में आत्ममंथन की है। प्रश्न यह नहीं कि भेदभाव कौन कर रहा है, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या हम सभी मिलकर ऐसी व्यवस्था बना पा रहे हैं, जहां किसी व्यक्ति को उसकी जाति, पृष्ठभूमि या पहचान के कारण स्वयं को अपमानित महसूस न करना पड़े?
यदि उत्तर “नहीं” है, तो फिर क्या यह समय नहीं है कि समाज, राजनीति, प्रशासन, पत्रकारिता और हर क्षेत्र में समान सम्मान, अवसर और सामाजिक न्याय की नई क्रांति का सूत्रपात किया जाए?
आखिर इंसान की पहचान उसकी जाति से होगी या उसके चरित्र, कर्म और योगदान से? यही प्रश्न आज पूरे समाज के सामने खड़ा है।


