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सनातन मर्यादा का प्रतीक

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आखिर हर क्षेत्र में संघर्ष कब तक? जाति, उपेक्षा और भेदभाव का दंश कब होगा समाप्त?…

आखिर हर क्षेत्र में संघर्ष कब तक? जाति, उपेक्षा और भेदभाव का दंश कब होगा समाप्त?…

 

रायपुर छत्तीसगढ़ – उमाशंकर दिवाकर की खास खबर—

क्या आज भी देश के अनेक लोगों को केवल अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण संघर्ष करना पड़ रहा है? क्या शिक्षा, रोजगार, राजनीति, प्रशासन, पत्रकारिता और सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समान अवसर मिलने के बावजूद सम्मान और स्वीकार्यता के लिए अलग लड़ाई लड़नी पड़ती है? आखिर यह संघर्ष कब तक जारी रहेगा?

संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अनेक लोग आज भी महसूस करते हैं कि उन्हें अपनी योग्यता से अधिक अपनी पहचान साबित करने की चुनौती का सामना करना पड़ता है। सवाल यह है कि यदि अवसर समान हैं, तो फिर सम्मान और विश्वास की लड़ाई क्यों बनी हुई है?

क्या हर क्षेत्र में प्रतिभा से पहले पहचान देखी जा रही है?

शिक्षा से लेकर नौकरी तक, सामाजिक संस्थाओं से लेकर राजनीतिक संगठनों तक, कई बार यह आरोप सुनाई देता है कि योग्य लोगों को उनका उचित स्थान नहीं मिल पाता। क्या यह स्थिति समाज के विकास में बाधा नहीं बन रही?

क्या कारण है कि मेहनत, ईमानदारी और क्षमता के बावजूद अनेक लोग स्वयं को हाशिये पर महसूस करते हैं? क्या कहीं न कहीं पूर्वाग्रह, समूहवाद और सामाजिक विभाजन की सोच आज भी प्रभावी है?

पत्रकारिता और सामाजिक जीवन में भी क्यों महसूस होती है दूरी?

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता का उद्देश्य समाज की आवाज बनना है। लेकिन क्या कुछ पत्रकारों को भी अपनी पहचान के कारण अतिरिक्त संघर्ष करना पड़ता है? क्या निष्पक्ष कार्य करने वालों को भी कभी-कभी अनदेखी, उपेक्षा या अविश्वास का सामना करना पड़ता है?

यदि समाज की आवाज उठाने वाले ही संघर्षरत रहेंगे, तो फिर वंचित और कमजोर वर्गों की आवाज कितनी मजबूती से सामने आ पाएगी?

क्या अपने ही लोगों को आपस में बांटने की राजनीति जारी है?

यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि आखिर समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करने की प्रवृत्ति क्यों बढ़ती दिखाई देती है? क्या लोगों को आपस में लड़ाकर कुछ ताकतें अपना हित साधती हैं? और यदि ऐसा है, तो सबसे अधिक नुकसान किसका होता है?

क्या समय नहीं आ गया है कि समाज ऐसे लोगों की पहचान करे जो एकता के बजाय दूरी बढ़ाने का काम करते हैं?

आखिर संघर्ष कब तक?

कब तक व्यक्ति को अपनी योग्यता साबित करने के साथ अपनी पहचान भी साबित करनी पड़ेगी?

कब तक सामाजिक सम्मान कुछ लोगों के लिए आसान और कुछ के लिए कठिन बना रहेगा?

कब तक प्रतिभाएं अवसरों की प्रतीक्षा में दम तोड़ती रहेंगी?

कब तक समाज के भीतर ईर्ष्या, द्वेष और भेदभाव की दीवारें खड़ी रहेंगी?

और आखिर कब तक हर क्षेत्र में संघर्ष ही संघर्ष दिखाई देगा?

नई सोच और नई क्रांति की आवश्यकता

समाज को यह तय करना होगा कि वह विभाजन की राजनीति के साथ आगे बढ़ना चाहता है या समानता, सम्मान और भाईचारे के रास्ते पर। किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति, वर्ग या पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि उसके कार्य, चरित्र और योगदान से होना चाहिए।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या हम ऐसा समाज बना पाएंगे, जहां हर व्यक्ति को सम्मान पाने के लिए संघर्ष नहीं, बल्कि अवसर मिले? या फिर आने वाली पीढ़ियां भी यही पूछती रहेंगी—”आखिर हर क्षेत्र में संघर्ष कब तक?”

Binod Kumar
Author: Binod Kumar

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