बालोद स्वास्थ्य महकमे में व्यापारियों का पोषण? सिकोसा गुंडरदेही में “विष का धंधा” बेरोकटोक!
बालोद/गुंडरदेही:-छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में चिकित्सा तंत्र अब हास्यास्पद हो चुका है। गुंडरदेही तहसील के सिकोसा गांव में फर्जी “शिव अर्पण क्लिनिक” नामक यह कथित चिकित्सा केंद्र बिना किसी वैध लाइसेंस, बिना मेडिकल कानून की मंजूरी और बिना योग्य चिकित्सक के मरीजों की जिंदगियों के साथ जोखिम भरा खेल खेल रहा है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि यह सारा काला कारोबार स्वास्थ्य अधिकारी सत्येंद्र मारकंडे की नाक के नीचे खुला आम हो रहा है।जिला मुख्य चिकित्सा व स्वास्थ्य अधिकारी, बालोद, जैसे कान पर जूं रेंग रही हो, मानो मानव जीवन उनके लिए महज संख्यात्मक आंकड़े मात्र हैं। यही वह स्वास्थ्य तंत्र है, जिसने कुछ महीनों पूर्व थाना अर्जुंदा के अंतर्गत कांदुल गांव में हुए “नकली चिकित्सक कांड” से कोई पाठ नहीं लिया, जहां बिना योग्यता के धोखेबाज वैद्य के गलत उपचार से एक बेकसूर व्यक्ति की सांसें थम गईं। क्या अब प्रशासन किसी अतिरिक्त शव का इंतजार कर रहा है? क्या “निगरानी” नामक कोई प्रणाली इस जिले में बाकी बची है, या फिर अधिकारी केवल पदासीन सजावटी वस्तु मात्र हैं?यह सारा घोटाला स्पष्ट रूप से भारतीय नर्सिंग परिषद अधिनियम, 1947 की धारा 10 तथा भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम, 1956 की धारा 15(2)(ब) का बर्बर उल्लंघन है, जहां बिना पंजीकरण या मान्यता प्राप्त डिग्री के चिकित्सा सेवाएं प्रदान करना अत्यंत दंडनीय अपराध है। फिर भी न तो कोई सूचना, न जांच, न कोई कदम—केवल मौन व भ्रष्ट आलस्य! यदि जिला प्रशासन व स्वास्थ्य महकमा ने इस पर शीघ्र ध्यान न दिया, तो यह “शिव अर्पण क्लिनिक” किसी भी पल “मृत्यु अर्पण केंद्र” में परिवर्तित हो सकता है। बालोद जैसे नाजुक जिले में नकली चिकित्सा केंद्रों की उभरती संख्या न केवल विधि की अवहेलना कर रही है, बल्कि निर्धन व ग्रामीण निवासियों के प्राणों से खुली साजिश रच रही है।सूत्रों के अनुसार, यह केंद्र रात्रि में एक कुख्यात वेश्यालय की भांति दुरुपयोग हो रहा है, जहां चिकित्सा के नाम पर अश्लील गतिविधियां फल-फूल रही हैं। अंदरूनी जानकारी से पता चला है कि यहां प्रशिक्षण-रहित कर्मचारी नशीली दवाओं का गैरकानूनी व्यापार चला रहे हैं, जो मरीजों को नशे की लत लगाकर फिरौती वसूलते हैं। स्थानीय निवासी लंबे समय से शिकायतें कर रहे हैं, लेकिन अधिकारी इन पर टालमटोल ही करते हैं। क्या सत्येंद्र मारकंडे जैसे अफसर इन नकली केंद्रों के संरक्षक हैं? क्या मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी का मौन किसी “मिलीभगत” का फल है? क्या सरकार इस बेनकाब अपराध पर आंखें बंद कर घातक अनुबंध दे रही है?अब समय है कि इस संपूर्ण घटना पर तत्काल एफआईआर दर्ज हो, “शिव अर्पण क्लिनिक” को बंद किया जाए, तथा सत्येंद्र मारकंडे समेत जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे चलाए जाएं। वरना बालोद का यह स्वास्थ्य विभाग किसी विशाल विपत्ति का कारण बनेगा—और तब अधिकारियों की दस्तावेजों में “आकस्मिक हादसा” लिखने से न तो हकीकत बदलेगी, न ही खोई हुई जानें वापस लौटेंगी।
सामाजिक कार्यकर्ता मोहन निषाद ने कटाक्ष किया कि “जहां चिकित्सा के बहाने जहर बेचा जा रहा हो, वहां स्वास्थ्य महकमा सबसे बड़ा अपराधी है।” यह केंद्र न केवल मरीजों की हत्या का अड्डा है, बल्कि सामाजिक व नैतिक पतन का प्रतीक भी बन चुका है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यहां आने वाले मरीजों को गलत दवाओं से जहर दिए जाते हैं, जिससे कईयों की हालत बिगड़ चुकी है। एक बुजुर्ग ने बताया कि उनके रिश्तेदार को साधारण बुखार में भर्ती कराया, लेकिन गलत इंजेक्शन से हालत बिगड़ते चले गए। फिर भी कोई जांच नहीं। यह सिलसिला रुकना चाहिए, वरना पूरा जिला स्वास्थ्य संकट में डूब जाएगा। सरकार को जागना होगा, अन्यथा जनता का विश्वास हमेशा के लिए टूट जाएगा।


