#प्रेम #
“”””””””””
फूलों से कह दो ,पराग बनाया न करें।
भौंरों से कह दो,इधर मण्डराया न करें।।
मेरे प्रेम से बढ़ कर, कोई चीज नहीं है।
भीखारी के झोले में पड़ा, कोई भीख नहीं है।।
सूरज में क्या दम है,जो सागर को सूखा सके।
प्रेम के छोटे से धागे में,बंधा हुआ है।।
टूटने पर फिर जोड़ो तो,गांठ पड़ जाते हैं।
यह शरीर का घाव नहीं,जो दवा से भर जाते हैं।।
कितने टूटे कितने जुड़े, पहचान है बता दे कोई।
जो जुड़ा टूट कर वही,सच्चा इंसान है भाई।।
मंगत रवीन्द्र, उरगा (कोरबा)


