“लाल ईंट के काले खेल में कौन-कौन शामिल..? पंचायत से लेकर दफ्तरों तक आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा अवैध कारोबार..?”

*बेमेतरा जिले में पेड़ों की बलि, कानून की धज्जियां और स्थानीय हक पर डाका… आखिर कब जागेगा प्रशासन..?*
बेमेतरा – छत्तीसगढ़ की धरती पर इन दिनों “लाल ईंट” का कारोबार सिर्फ भट्टों की आग में नहीं, बल्कि सिस्टम की मिलीभगत में भी खूब पक रहा है। बेमेतरा जिले के कई क्षेत्रों में अवैध ईंट भट्टों का कारोबार इस कदर फल-फूल रहा है कि मानो नियम-कायदे सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हों।
ग्रामीणों का आरोप है कि चंद पैसों और निजी स्वार्थ के लिए कुछ ग्राम पंचायतों के सरपंच, सचिव और जिम्मेदार अधिकारी बाहरी लोगों को संरक्षण देकर स्थानीय लोगों के हक और अधिकार पर खुला डाका डाल रहे हैं।
*“स्थानीय कुम्हार बेरोजगार… बाहरी लोगों के भट्टे गुलजार..?”*
क्षेत्र में चर्चा है कि परप्रांतीय प्रजापति समाज के कुछ लोगों को नियमों की अनदेखी कर स्थानीय निवासी प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, आधार दस्तावेज और यहां तक कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ तक दिलाया गया।
अब सवाल यह उठ रहा है कि —
आखिर जिन लोगों का मूल निवास ही दूसरे राज्यों में है, उन्हें इतनी आसानी से स्थानीय दस्तावेज किसके संरक्षण में मिले..?
*क्या सरकारी रिकॉर्ड अब जांच से नहीं, “सेटिंग” से बनते हैं..?*
दूसरी ओर स्थानीय कुम्हार और गरीब परिवार अपने ही अधिकारों के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
जिन योजनाओं पर पहला हक स्थानीय जरूरतमंदों का होना चाहिए था, वहां कथित तौर पर बाहरी लोगों को प्राथमिकता दिए जाने से भारी नाराजगी है।
*“ईंट पकाने में जल रहे पेड़… और सूख रहा गांव का पानी..!”*
ग्रामीणों का कहना है कि अवैध ईंट भट्टों में हरे-भरे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है।
दिन-रात जलती भट्टियों के लिए गांवों के आसपास के पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे पर्यावरण और भूजल स्तर दोनों पर गंभीर असर पड़ रहा है। एक तरफ बेमेतरा जिले के कई गांव पेयजल संकट से जूझ रहे हैं, दूसरी तरफ जंगल और पेड़ ईंट भट्टों की आग में झोंके जा रहे हैं।
अब जनता पूछ रही है
*क्या प्रशासन को धुएं के गुबार दिखाई नहीं देते..?*
या फिर सब कुछ देखकर भी आंखें बंद रखी गई हैं..?
*“सरपंच-सचिव विकास कर रहे हैं या दस्तावेजों की दलाली..?”*
ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि कुछ पंचायतों में बिना गहरी जांच के दस्तावेज जारी किए गए।
यदि आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि स्थानीय लोगों के अधिकारों के साथ खुला छल माना जाएगा।
लोग पूछ रहे हैं —
क्या ग्राम पंचायतें अब जनसेवा का केंद्र हैं या “दस्तावेज निर्माण केंद्र”..?
क्या कुछ जिम्मेदार लोग पंचायत की मुहर को निजी कमाई का जरिया बना चुके हैं..?
*“प्रधानमंत्री आवास तक पहुंच गया खेल..?”*
सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से स्थानीय निवासी और जाति प्रमाण पत्र मिले, तो फिर सरकारी योजनाओं का लाभ लेना भी आसान हो जाता है।
ऐसे में प्रधानमंत्री आवास जैसी योजनाओं में यदि अपात्र लोगों को लाभ मिला है, तो यह सीधे गरीब और वास्तविक हितग्राहियों के अधिकारों पर चोट है।
जनता की मांग — हो उच्च स्तरीय जांच
ग्रामीणों और स्थानीय लोगों ने मांग की है कि —
जिले में संचालित सभी अवैध ईंट भट्टों की जांच हो
हरे पेड़ों की कटाई और पर्यावरण नुकसान पर कार्रवाई हो
संदिग्ध स्थानीय निवासी और जाति प्रमाण पत्रों की जांच कर निरस्त किया जाए
अपात्र लोगों को मिले प्रधानमंत्री आवास और राशन कार्ड की जांच हो
दोषी सरपंच, सचिव और संबंधित अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज हो
व्यंग्य की चोट
“यहां कानून नहीं, पहचान बिकती है…
पंचायत की मुहर में पूरी दुकान बिकती है…
स्थानीय हकदार लाइन में खड़े रह जाते हैं,
और सेटिंग वालों को आवास से राशन तक आसान दिखती है…!”
अब देखना होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले को गंभीरता से लेकर कार्रवाई करता है या फिर लाल ईंट की आग में कानून और स्थानीय अधिकार दोनों यूं ही जलते रहेंगे।


