“धान खरीदी या भ्रष्टाचार की मंडी..? किसान के नाम पर कमीशनखोरी का खेल आखिर कब तक..?”

@therambhaktTRBnews:- बेमेतरा जिले की सेवा सहकारी समितियों में धान शॉर्टेज, कमीशन और बंद लिफाफों का ऐसा खेल, जिसने सुशासन के दावों पर खड़े कर दिए बड़े सवाल…!
बेमेतरा।
छत्तीसगढ़ में किसानों को भगवान और अन्नदाता कहने वाली व्यवस्था के भीतर ही यदि किसानों की मेहनत, पसीना और हक को कागजों में निगला जाने लगे, तो सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नीयत का खड़ा होता है। बेमेतरा जिले की सेवा सहकारी समितियों में धान खरीदी के नाम पर चल रहा शॉर्टेज, कमीशन और फर्जी हिसाब-किताब का खेल अब धीरे-धीरे परत दर परत खुलने लगा है।
सवाल यह नहीं कि धान शॉर्टेज कैसे हुई…?
सवाल यह है कि हर साल लाखों की शॉर्टेज होती कैसे रहती है और उसके बाद भी जिम्मेदार कुर्सियों पर जमे कैसे रहते हैं..?
“कागज में धान गायब, गोदाम में हिसाब साफ… आखिर चमत्कार कौन कर रहा है..?”
धान खरीदी केंद्रों में किसानों से पूरी मात्रा में धान खरीदी जाती है, लेकिन बाद में रिकॉर्ड में कहीं न कहीं “शॉर्टेज” निकल आती है। फिर शुरू होता है असली खेल…!
कहीं परिवहन पर ठीकरा फोड़ा जाता है, कहीं भंडारण पर, तो कहीं मौसम और नमी को जिम्मेदार बताकर मामला दबा दिया जाता है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि —
यदि शॉर्टेज वास्तव में लापरवाही या गबन है, तो दोषियों की संपत्ति जब्त क्यों नहीं होती..?
क्यों हर बार समिति के कमीशन की राशि से भरपाई कर भ्रष्टाचार पर पर्दा डाल दिया जाता है..?
क्या यह “चोरी भी, सीनाजोरी भी” वाला मामला नहीं है..?
“किसानों के खाते में नियम, अफसरों के खाते में आराम..?”
एक किसान यदि बैंक की किश्त लेट कर दे तो नोटिस, ब्याज और वसूली तुरंत शुरू हो जाती है।
लेकिन यदि किसी समिति में लाखों की धान शॉर्टेज हो जाए तो फाइलें धीरे चलती हैं, जांच लंबी चलती है और जिम्मेदार आराम से कुर्सी पर बैठे रहते हैं।
आखिर क्यों..?
क्या इसलिए क्योंकि यहां गरीब किसान नहीं, बल्कि “सिस्टम के खिलाड़ी” बैठे हैं..?
“बैंक, समिति, खाद्य विभाग और विपणन… आखिर किसके संरक्षण में पल रहा खेल..?”
ग्रामीणों और किसानों के बीच चर्चा है कि धान खरीदी का यह खेल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क का मामला है।
सहायक समिति प्रबंधक, बैंक शाखा प्रबंधक, नोडल अधिकारी, खाद्य विभाग और विपणन विभाग के कुछ जिम्मेदारों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
लोग पूछ रहे हैं —
क्या बिना ऊपर तक जानकारी पहुंचे लाखों की गड़बड़ी संभव है..?
क्या हर साल होने वाली शॉर्टेज महज संयोग है या सुनियोजित भ्रष्टाचार..?
“बंद लिफाफों में बिकती जांच और फाइलों में दफन होता सच..?”
क्षेत्र में चर्चा यह भी है कि जांच शुरू होने से पहले ही “सेटिंग” शुरू हो जाती है।
फाइलें खुलती कम हैं, दबती ज्यादा हैं।
कार्रवाई का शोर उठता जरूर है, लेकिन अंत में मामला “समिति के कमीशन से समायोजन” में खत्म हो जाता है।
यानि चोरी करो, शॉर्टेज दिखाओ, फिर कमीशन से हिसाब बराबर कर दो…!
अगर यही नियम है, तो फिर भ्रष्टाचार रुकेगा कैसे..?
“धान खरीदी केंद्र या भ्रष्टाचार प्रशिक्षण केंद्र..?”
अब सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि हर साल यही खेल चलता रहा, तो क्या सेवा सहकारी समितियां किसानों की मदद का केंद्र रहेंगी या भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बन जाएंगी..?
किसानों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच हुई तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं।
लोग मांग कर रहे हैं कि जिले की सभी समितियों की पिछले वर्षों की धान खरीदी, परिवहन, भंडारण और बैंकिंग रिकॉर्ड की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
जनता पूछ रही है… जवाब कौन देगा..?
धान शॉर्टेज की असली जिम्मेदारी किसकी..?
कमीशन की राशि से भरपाई क्यों..?
दोषियों पर एफआईआर और संपत्ति जब्ती कब..?
किसानों पर सख्ती और भ्रष्ट अफसरों पर नरमी क्यों..?
आखिर बंद लिफाफों का खेल कब बंद होगा..?
व्यंग्य में व्यवस्था पर चोट
“यहां धान नहीं, ईमान तौला जाता है…
कागजों में घाटा, जेबों में फायदा बोला जाता है…
किसान लाइन में खड़ा रह जाता है,
और भ्रष्टाचार एसी कमरों में खोला जाता है…!”
अब देखना होगा कि प्रशासन इन सवालों का जवाब देता है या फिर हर साल की तरह धान खरीदी का “शॉर्टेज महोत्सव” मनाकर किसानों के जख्मों पर केवल आश्वासन का मरहम लगाया जाता रहेगा।


