जब सिस्टम सो जाए, तब एक आवाज काफी होती है…बेजुबानों की पुकार, और एक नाम… दीपक सिंह दिनकर

रायपुर छत्तीसगढ़ – बेमेतरा – क्षेत्र में जब गौवंश सड़कों पर भटकता रहा, खेतों में किसानों की फसलें उजड़ती रहीं और जिम्मेदार आंखें मूंदे बैठे रहे… तब एक युवा आगे आया — दीपक सिंह दिनकर (बीडीसी)। यह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष की वो चिंगारी है जो आज जन-जन में आग बनकर फैल रही है। गौवंश की रक्षा बनाम सिस्टम की चुप्पी जहां एक ओर बेजुबान गौवंश हादसों का शिकार हो रहा है, वहीं दूसरी ओर किसान रात-रात भर जागकर अपनी फसल बचाने को मजबूर हैं। सवाल उठता है —
क्या प्रशासन सिर्फ कागजों तक सीमित है…? दीपक सिंह दिनकर ने इन हालात को बदलने की ठानी। खुद सड़कों पर उतरकर गौवंश को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना, किसानों के खेतों की रखवाली करना… यह संघर्ष आज आंदोलन का रूप ले चुका है। तेज सवाल — प्रशासन के लिए आईना आखिर क्यों गौशालाओं की हालत बदहाल है? क्यों सड़कों पर बेजुबान मरने को मजबूर हैं?किसान की मेहनत का जिम्मेदार कौन? जब जवाब नहीं मिला… तो दीपक ने खुद जवाब बनना चुना।
“जो खामोश रहे, वो गुनहगार नजर आते हैं,
जो आवाज उठाए, वही असली हकदार कहलाते हैं…
ये वक्त है उठ खड़े होने का दोस्तों,
वरना इतिहास में हम भी शर्मसार नजर आते हैं…!”
जान की बाजी लगाकर भुख हडताल और अब सिंगनल चौक पर धरना तथा शासन प्रशासन का कई बार विरोध, कई बार खतरे… लेकिन कदम नहीं रुके। दीपक सिंह दिनकर आज उन युवाओं के लिए मिसाल बन चुके हैं जो बदलाव चाहते हैं, पर पहल नहीं करते।जनता का समर्थन, प्रशासन पर दबाव अब यह सिर्फ एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं रहा…यह जनता की आवाज बन चुका है।
लोग खुलकर साथ आ रहे हैं और प्रशासन से ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।अंत में एक सवाल…
अगर एक युवा यह कर
सकता है, तो पूरा सिस्टम क्यों नहीं…?
“अब खामोशी नहीं, बदलाव की बारी है…बेजुबानों की रक्षा ही हमारी जिम्मेदारी है…!”


