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August 4, 2026 12:44 pm

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द राम भक्त

सनातन मर्यादा का प्रतीक

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बेमेतरा जिला मुख्यालय की खास खबर *“तबादले की आंधी चली तो कई चेहरों से रंग उतर गए…

बेमेतरा जिला मुख्यालय की खास खबर *“तबादले की आंधी चली तो कई चेहरों से रंग उतर गए…

 

रायपुर – बेमेतरा में इन दिनों तबादलों की एक फाइल ने ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है कि “दरबार से लेकर दफ्तर तक” हलचल मची हुई है। अनुविभागीय अधिकारी के आदेश के बाद 6 पटवारियों के तबादले ने सियासी गलियारों और भू-माफियाओं के बीच सरगर्मियां तेज कर दी हैं। अब सवाल ये उठ रहा है—क्या ये सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया है या फिर “जिस थाली में खाया, उसी में छेद” वाली कहानी सामने आ रही है?

तबादले की लिस्ट कुछ यूं है:

अभिषेक माली—झिरिया से बेमेतरा

विजेंद्र वर्मा—बेमेतरा से ढारा

शैलेश वैष्णव—मऊ

बोधीराम निषाद—कोबिया (बेमेतरा) से बालसमुद

नेहा शर्मा—ढारा से तहसील कार्यालय बेमेतरा

दिलीप रात्रे—बालसमुद से कोबिया (बेमेतरा) अब असली “कहानी में ट्विस्ट” यहीं से शुरू होता है…

 

 

*शायरी में सुनिए हालात*

 

 

“कुर्सी की मोहब्बत भी क्या चीज़ होती है जनाब,

छूटे तो दिल रोता है, मिले तो रौब होता है…”

 

 

बताया जा रहा है कि वर्षों से एक ही जगह जमे पटवारियों के हौसले इतने बुलंद हो गए थे कि अब ग्रामीण क्षेत्रों में जाने का नाम सुनते ही “पसीना छूटने” लगा है।

 

*सवाल अब ये है..!*

 

क्या नौकरी सिर्फ शहर के आराम के लिए है?

 

क्या गांव की जमीन अब “कमाई का जरिया” नहीं रही?

 

या फिर शहर छोड़ते ही “समीकरण” बिगड़ने का डर सता रहा है?

 

*मुहावरे में कहें तो..!*

 

“मछली पानी से बाहर आते ही तड़पती है”, लेकिन यहां तो मामला कुछ और ही नजर आ रहा है…!

सूत्रों की मानें तो कुछ पटवारी मंत्री और नेताओं के दरबार में फरियाद लगाते नजर आ रहे हैं। वहीं चर्चा ये भी है कि भू-माफियाओं के साथ मिलकर प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बनाने की कोशिश हो रही है।

 

 

*एक और तीखी शायरी*

 

 

“जो कल तक खुद को कानून का रखवाला बताते थे,

आज तबादले के डर से सिफारिशें करवाते हैं…”

 

 

*अब बड़ा सवाल..?*

 

 

क्या यह तबादला “सिस्टम सुधारने” की कोशिश है?

या फिर “ऊपर से दबाव” बनाकर आदेश बदलवाने का खेल शुरू हो चुका है?

 

*जनता पूछ रही है..*

 

अगर नौकरी करनी है तो “जहां पोस्टिंग, वहीं ड्यूटी” क्यों नहीं?

 

आखिर ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने से परहेज क्यों?

 

और सबसे अहम—क्या प्रशासन इस दबाव के आगे झुकेगा या “लकीर का फकीर” बनकर नियमों पर कायम रहेगा?अंत में एक चुभता सवाल और शेर:

 

“हकीकत से भागकर कब तक बचोगे साहब,किस्मत की पोस्टिंग हर जगह करनी पड़ेगी…”

 

अब देखना ये है कि बेमेतरा में ये तबादला आदेश कायम रहता है या फिर “सियासी आंधी” में उड़ जाता है…?

Binod Kumar
Author: Binod Kumar

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