सामाजिक चेतना एवं मूल्य विकास में शिक्षक की अहम भूमिका।
भारतीय संस्कृति एवं समाज में शिक्षक को ईश्वर का दर्जा दिया गया है। प्राचीन काल में चाहे गुरू कुल परंपरा हो या वर्तमान समय में बाल केन्द्रित शिक्षा पद्धति, शिक्षक का विशिष्ट स्थान है। शिक्षक का कार्य किसी जाति, समुदाय, धर्म विशेष तक सीमित नही है अपितु एक व्यापक दृष्टिकोण है जो एक सभ्य, आधुनिक समाज में आवश्यक है।समाज में सभी लोगों का सर्वांगीण विकास एक शिक्षक के समर्पण के कारण ही संभव हो सकता है।देश काल परिस्थिति के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन होता रहा है जिसे शिक्षक सहर्ष स्वीकार कर भावी पीढ़ी को गढ़ने में अपना योगदान देता है।बच्चा जब अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि से शाला में आता है तो उसे शिक्षक ही सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक मूल्यों से सुसज्जित करता है।एक अबोध बालक में संस्कार और नैतिक चेतना जागृत करता है जिससे बच्चा अनुशासित होकर अपने जीवन के सार्थक उद्देश्यों को प्राप्त कर पाता है।एक सच्चे शिक्षक कभी अपने विद्यार्थियों को गलत शिक्षा नही दे सकता,वह अभावों के बीच अपना दायित्व निर्वहन कर उन्हें विचारवान, ज्ञानवान बनाता है।समाज में विद्यमान अनेकों रीति रिवाज, परंपरा, संस्कृति के मध्य वैचारिक रूप से सशक्त बनाता है। इसलिए शिक्षक को “राष्ट्र निर्माता” कहा गया है।
चूंकि गुरू परंपरा भारतवर्ष की अमूल्य धरोहर रहा है। विभिन्न समुदायों में जन्मे संतो,गुरूओं व महापुरूषों ने अपने अथाह ज्ञान से भारतभूमि को सिंचित कर पल्लवित किया है। शिक्षकों के इन्हीं कार्यों से प्रभावित होकर भारत के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन जी ने अपने जन्मदिवस को राष्ट्र के समस्त शिक्षकों को शिक्षक दिवस के रूप में समर्पित किया।आज सम्पूर्ण भारतवर्ष में उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।समाज में जिस तरह अपने अथाह ज्ञान और परिश्रम से शिक्षकों ने योगदान देकर भारतवर्ष को एक विकसित राष्ट्र के सामने लाकर खड़ा कर दिया है वह निश्चित ही सराहनीय कार्य है।विश्व के प्रभुत्व सम्पन्न देशों के सामने आज भारतीय शिक्षा पद्धति श्रेष्ठतम शिखर पर पहुंच चुकी है जिसके परिणामस्वरूप हम चन्द्र यान पर अपने परचम लहराने में सफल हो रहे हैं।
निष्कर्ष के तौर पर किसी भी राष्ट्र के निर्माण में बिना शैक्षणिक उन्नति के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक उन्नति संभव नही है इसलिए शिक्षक की इस महत्वपूर्ण भूमिका को सम्मान देकर अपने परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखें। जिससे शिक्षक भी अपने आप को गौरवान्वित महसूस करे।


