,## भोर##
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झुकी हुई टहनी से पूछो,
वह क्यों झुक जाती है।
इसीलिए कि, खुशबू वाली,
कलियाॅं लद जाती हैं।।
चिटियों के रेंगने से तरु’
कभी नहीं हिल पाते हैं।
पुष्प रस लोरस में वे,
भौंरे मंद गीत गाते हैं।।
हवा भी चलती तितली उड़ते,
सूखे पत्ते गिर जाते हैं।
नवकरण की रीत यही,
नवल पात उग आते हैं।।
भोर पात पर नन्हें-नन्हें,
मोतियाॅं झिलमिलाते हैं।
सूरज नमन करते हुए,
अंतर्ध्यान हो जाते हैं।।
सर पर जल घट वय किशोरी,
ले चली आतुर मन से।
पग नूपुर की नूर छवि,
कर कलियाॅं चूड़ी खन के।।
कथरी टार शिशु देख रहा,
माॅं जो झाड़ू लगा रही।
बाहर बैठी नन्ही चिड़िया,
उचक-उचक कर गा रही।।
उबल रही चूल्हे पर चाय,
काकी कप में ढार रही।
दादी को खाॉंसी आई तो,
टिन कपाट उघार रही।।
क्षितिज पर छाई सिन्दूर बदरी,
खड़ी दीवार पोताई है।
किसने पोता जान दिवाली,
कारीगरी वह लाई है।।
(इसमें कुछ छत्तीसगढ़ी शब्दों का आगमन हुआ है इसका भी सम्मान करें)
मंगत रवीन्द्र, कोरबा


