#जवानी लौट आती है #
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धरती के सीने पर,
हल की कलम से,
लकीर खींचता किसान।
जीवन के उभरे सारे शब्द,
श्रम का सुहाता है गान।।
ढेले पर पसीने के बूंद
जब टपक जाते हैं।
सीप में स्वाति की बून्द सा,
मोती बन जाते हैं।।
हल के पीछे पाॅंव के चिन्ह,
जब कुंड़ में पड़ जाते हैं।
बड़े सुहाने अल्पना के,
छाप बड़े पड़ जाते हैं।।
बैल की जोड़ी सर ऊॅंचा,
करके, कभी पगुराते हैं।
राहगीर जब मेड़ पर चलते,
चलते वे ठहर जाते हैं।।
अरे ललकार और साल्हो के तान,
खार में गूंज जाते हैं।
रस्सी खींचती कुॅंए पर,
बालाएॅंठिठट जाती हैं।।
गदगद -गदगद नास चले तो,
नदी की लहरें लजाती हैं।
भूखे जान दोपहरी को गौटिन,
दोना में अंगाकर लाती हैं।।
सिर
#जवानी लौट आती है #
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धरती के सीने पर,
हल की कलम से,
लकीर खींचता किसान।
जीवन के उभरे सारे शब्द,
श्रम का सुहाता है गान।।
ढेले पर पसीने के बूंद
जब टपक जाते हैं।
सीप में स्वाति की बून्द सा,
मोती बन जाते हैं।।
हल के पीछे पाॅंव के चिन्ह,
जब कुंड़ में पड़ जाते हैं।
बड़े सुहाने अल्पना के,
छाप बड़े पड़ जाते हैं।।
बैल की जोड़ी सर ऊॅंचा,
करके, कभी पगुराते हैं।
राहगीर जब मेड़ पर चलते,
चलते वे ठहर जाते हैं।।
अरे ललकार और साल्हो के तान,
खार में गूंज जाते हैं।
रस्सी खींचती कुॅंए पर,
बालाएॅंठिठट जाती हैं।।
गदगद -गदगद नास चले तो,
नदी की लहरें लजाती हैं।
भूखे जान दोपहरी को गौटिन,
दोना में अंगाकर लाती हैं।।
सिर का पागा उतार कर,
पोंछत गाल के पसीने।
अॅंगुली मोरी रोटी के टुकड़े,
डारत मुॅंह के एक कोने।।
लुगरा के किनारी हवा के झोंके,
पाकर जब लहराती है।
तन परसे किसान अब हरसे,
जवानी फिर लौट आती है।।
मंगत रवीन्द्र, कोरबा
का पागा उतार कर,
पोंछत गाल के पसीने।
अॅंगुली मोरी रोटी के टुकड़े,
डारत मुॅंह के एक कोने।।
लुगरा के किनारी हवा के झोंके,
पाकर जब लहराती है।
तन परसे किसान अब हरसे,
जवानी फिर लौट आती है।।
मंगत रवीन्द्र, कोरबा


