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August 4, 2026 10:45 am

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द राम भक्त

सनातन मर्यादा का प्रतीक

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अन्नदाता की कौन सुनेगा भाई..? कागज़ों में किसान हितैषी सरकार… ज़मीनी हकीकत में परेशान किसान !

अन्नदाता की कौन सुनेगा भाई..?

कागज़ों में किसान हितैषी सरकार… ज़मीनी हकीकत में परेशान किसान !

रिपोर्ट – विशेष संवाददाता

बेमेतरा/साजा/ नवागढ/ बेरला –

एक तरफ सरकारें मंचों से बड़े-बड़े दावे करती हैं कि वे किसानों की हितैषी हैं, किसानों की आय बढ़ाने और खेती को आसान बनाने के लिए लगातार योजनाएं चला रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ ज़मीनी हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। अब किसानों के सामने डीजल लेने की नई समस्या खड़ी हो गई है, जिसने अन्नदाताओं की चिंता और बढ़ा दी है।

ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि कई पेट्रोल पंपों में किसानों को डीजल देने से पहले ट्रैक्टर लाने की शर्त रखी जा रही है। सवाल यह उठता है कि यदि ट्रैक्टर में डीजल ही नहीं बचा है तो किसान आखिर 15 से 20 किलोमीटर दूर स्थित पेट्रोल पंप तक ट्रैक्टर कैसे पहुंचाए..?

यह केवल एक सामान्य समस्या नहीं, बल्कि खेती-किसानी को सीधे प्रभावित करने वाला गंभीर मामला बनता जा रहा है।

किसका आदेश…? किसान पूछ रहे बड़ा सवाल

किसानों का कहना है कि आखिर ऐसा कौन-सा आदेश जारी हुआ है जिसमें ट्रैक्टर को पेट्रोल पंप तक लाना अनिवार्य कर दिया गया है..?

यदि कोई सरकारी आदेश है तो प्रशासन उसे सार्वजनिक क्यों नहीं कर रहा..?

और यदि कोई लिखित आदेश नहीं है तो आखिर पेट्रोल पंप संचालक किसानों को क्यों परेशान कर रहे हैं..?

गांवों में रहने वाले अधिकांश छोटे और मध्यम किसान पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। खेती का खर्च बढ़ चुका है, खाद-बीज महंगे हैं, ऊपर से डीजल की इस नई व्यवस्था ने किसानों की परेशानी दोगुनी कर दी है।

15 से 20 किलोमीटर दूर पंप… किसान जाए तो जाए कैसे..?

ग्रामीण इलाकों में कई गांव ऐसे हैं जहां से पेट्रोल पंप की दूरी 15 से 20 किलोमीटर तक है।

यदि ट्रैक्टर में डीजल खत्म हो गया हो तो किसान उसे धक्का देकर ले जाए या टोचन कराए..?

क्या प्रशासन ने कभी इस समस्या की वास्तविक स्थिति समझने की कोशिश की..?

किसानों का कहना है कि पहले वे ड्रम या जरीकेन में डीजल ले जाकर खेती का काम कर लेते थे, लेकिन अब कई जगहों पर उन्हें डीजल देने से मना किया जा रहा है। इससे खेती का कार्य प्रभावित हो रहा है और समय पर जुताई-बुवाई नहीं हो पा रही।

यदि फसल प्रभावित हुई तो जिम्मेदार कौन..?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि डीजल नहीं मिलने के कारण किसानों की खेती प्रभावित होती है, फसल खराब होती है या समय पर बुवाई नहीं हो पाती, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा..?

क्या जिला प्रशासन किसानों की नुकसानी की भरपाई करेगा..?

या फिर हमेशा की तरह किसान ही अपने नुकसान का बोझ उठाने मजबूर होगा..?

जिला प्रशासन मौन क्यों..?

इस पूरे मामले में जिला प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है।

क्या प्रशासन को किसानों की परेशानी दिखाई नहीं दे रही..?

क्या अधिकारियों ने पेट्रोल पंप संचालकों से चर्चा कर कोई समाधान निकालने की कोशिश की..?

यदि सुरक्षा कारणों से कोई नियम लागू किया गया है, तो प्रशासन को किसानों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी करनी चाहिए थी। लेकिन यहां तो नियम बना दिए गए और किसान को उसके हाल पर छोड़ दिया गया।

किसानों की मांग

किसानों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि—

किसानों को जरीकेन या ड्रम में डीजल देने पर तत्काल स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं।

ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों के लिए विशेष राहत व्यवस्था बनाई जाए।

पेट्रोल पंपों की मनमानी पर रोक लगाई जाए।

किसानों को बेवजह परेशान करने वालों पर कार्रवाई हो।

अंत में बड़ा सवाल…

सरकारें यदि वास्तव में किसान हितैषी हैं तो अन्नदाता को हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है..?

आखिर किसान की पीड़ा सुनने वाला कौन है..?

और कब तक खेतों में पसीना बहाने वाला अन्नदाता व्यवस्था के सामने यूं ही बेबस खड़ा रहेगा..?

Binod Kumar
Author: Binod Kumar

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