विकास के वादे कागज में कैद… जमीनी हकीकत में कीचड़, अंधेरा और प्यास…

नवागढ़ विधानसभा – जंगलपुर, धौराभाठा, हरिहरपुर नवागढ़ विधानसभा के अंतर्गत आने वाले जंगलपुर, धौराभाठा और हरिहरपुर के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
जहां एक ओर मंचों से “विकास” के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर सच्चाई यह है कि—
बरसात आते ही सड़कें दलदल बन जाती हैं
बिजली की आंख-मिचौली आम बात है
पेयजल के लिए महिलाएं मीलों चलने को मजबूर हैं
स्कूल भवन जर्जर, बच्चों का भविष्य अधर में
हालात इतने बदतर हैं कि ग्रामीण कहते हैं—
“बरसात में तो इंसान क्या, पशु से भी बदतर जिंदगी जीनी पड़ती है…”
*ग्रामीणों का फूटा गुस्सा*
जनप्रतिनिधियों से बार-बार शिकायत के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
अब हालात ऐसे हैं कि ग्रामीणों ने जनगणना का विरोध करने तक का मन बना लिया है।
*ग्रामीणों का साफ कहनाहै*
“जब सरकार हमारी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर सकती, तो हम आंकड़ों में क्यों शामिल हों?”
*बड़ा सवाल – जिम्मेदार कौन?* क्या यह प्रशासन की लापरवाही है? या फिर जनप्रतिनिधियों की वादाखिलाफी?
सत्ता में बैठने के बाद क्या सच में जनता की सेवा भूल जाते हैं नेता?
*करारा वार इस अंदाज में–*
“वोटों के मौसम में जो दर-दर झुके थे,
आज वही कुर्सी पर बैठकर रुके हैं…
विकास के सपने दिखाए थे जिसने,
आज वही वादों से मुकर के थके हैं…”
“कीचड़ में डूबी है गांव की हर राह,
बिजली-पानी बन गए सिर्फ एक चाह…
जनता पूछे अब किससे अपना हक,
जब नेता ही भूल गए अपनी हर एक चाह…”
*चेतावनी या बदलाव की शुरुआत?*
अगर समय रहते प्रशासन और जनप्रतिनिधि नहीं चेते,
तो यह विरोध आने वाले समय में बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
*निष्कर्ष की बात करे तो*
विकास के दावे तभी सच होंगे जब जंगलपुर, धौराभाठा और हरिहरपुर जैसे गांवों तक सुविधाएं पहुंचेंगी।
वरना ये “खास खबर” सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सिस्टम पर एक करारा तमाचा बनती रहेगी।अगर चाहें तो मैं इसके लिए


