*सफलता की कहानी*
अज्ञानता से जागरूकता तक: राष्ट्रीय पोषण माह अभियान से बदली लीला निषाद की जिंदगी

*कुपोषण और एनीमिया से जूझने वाली महिला बनी स्वास्थ्य जागरूकता की मिसाल*
*बेमेतरा, 26 मार्च 2026:* ग्राम देवरी, परियोजना बेरला, जिला बेमेतरा की रहने वाली लीला निषाद आज अपने गाँव की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। कभी कुपोषण और एनीमिया जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझने वाली लीला आज स्वस्थ जीवनशैली और संतुलित आहार की मिसाल बन गई हैं। इस सकारात्मक परिवर्तन का श्रेय वे राष्ट्रीय पोषण माह अभियान को देती हैं, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
*संघर्ष भरा शुरुआती जीवन*
लीला निषाद का विवाह वर्ष 2016 में ग्राम देवरी निवासी भागीरथी निषाद के साथ हुआ। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और उनके पति मजदूरी कर किसी तरह घर का गुजारा करते थे। विवाह के एक वर्ष बाद लीला गर्भवती हुईं, लेकिन पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और सही जानकारी के अभाव में उन्होंने एक अस्वस्थ एवं कुपोषित बच्चे को जन्म दिया। दुर्भाग्यवश जन्म के कुछ ही दिनों बाद उस बच्चे की मृत्यु हो गई।इस घटना ने लीला को मानसिक रूप से गहरा आघात पहुंचाया। धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य भी कमजोर होने लगा। स्वास्थ्य जांच के दौरान पता चला कि वे एनीमिया से ग्रस्त हो चुकी हैं। उस समय उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि अपने स्वास्थ्य को कैसे सुधारा जाए।
*आंगनबाड़ी से मिली नई उम्मीद*
एक दिन गाँव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती अमरौतिन साहू ने उन्हें आंगनबाड़ी केंद्र में आयोजित राष्ट्रीय पोषण माह के पोषण मेले में आने के लिए आमंत्रित किया। शुरुआत में लीला झिझकीं, लेकिन कार्यकर्ता के आग्रह पर वे केंद्र पहुंचीं।पोषण मेले में उन्होंने पहली बार हरी सब्जियों, दालों, अनाज, फलों और स्थानीय पौष्टिक खाद्य पदार्थों की आकर्षक प्रदर्शनी देखी। स्वास्थ्य कर्मियों और कार्यकर्ताओं ने गर्भवती महिलाओं के लिए संतुलित आहार के महत्व, आयरन, कैल्शियम, फोलिक एसिड और एल्बेन्डाजोल जैसी दवाओं के नियमित सेवन, स्वच्छता और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी।इस कार्यक्रम ने लीला के मन में एक नई सोच पैदा की। उन्हें एहसास हुआ कि कई बीमारियां अज्ञानता के कारण होती हैं और सही जानकारी ही उनका सबसे बड़ा समाधान है।
*जीवनशैली में आया सकारात्मक बदलाव*
इसके बाद लीला नियमित रूप से आंगनबाड़ी केंद्र जाने लगीं। वे पोषण माह के दौरान आयोजित गतिविधियों — पोषण परामर्श सत्र, हरी सब्जी प्रतियोगिता और पौष्टिक आहार प्रदर्शनी — में सक्रिय रूप से भाग लेने लगीं। धीरे-धीरे उनके व्यवहार, सोच और जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव आने लगा।वर्ष 2019 में जब लीला फिर से गर्भवती हुईं, तब वे पहले से अधिक जागरूक थीं। उन्होंने संतुलित आहार लेना शुरू किया, नियमित टीकाकरण कराया, आयरन और कैल्शियम सप्लीमेंट का सेवन किया तथा स्वच्छता को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना लिया।
*स्वस्थ बेटी के जन्म से लौटी खुशियां*
इन सभी प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि 31 मार्च 2020 को लीला ने एक स्वस्थ बालिका को जन्म दिया। बच्ची को गोद में लेते हुए उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे। उस पल उन्हें महसूस हुआ कि सही जानकारी और जागरूकता से जीवन को नई दिशा दी जा सकती है।
*आज बनीं अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा*
आज लीला निषाद न केवल स्वयं स्वस्थ और जागरूक हैं, बल्कि अपने गाँव की अन्य महिलाओं को भी पोषण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करती हैं। वे हर वर्ष राष्ट्रीय पोषण माह के आयोजन में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं और अपने अनुभव साझा कर महिलाओं को संतुलित आहार और स्वास्थ्य के प्रति प्रेरित करती हैं।लीला की कहानी इस बात का प्रमाण है कि जब सरकारी योजनाएँ जनभागीदारी से जुड़ती हैं, तो वे लोगों के जीवन में वास्तविक और सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं।राष्ट्रीय पोषण माह अभियान आज केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि स्वस्थ भारत की दिशा में एक जन आंदोलन बन चुका है, जिसने लीला निषाद जैसी अनेक महिलाओं के जीवन में नई रोशनी जगाई है।


