भारतीय पैसा सिक्का और रूपयों की संकलन कर बनाई अपनी पहचान…महेंद्र देशमुख

*भारतीय लोगों में बचत की अनोखी परम्परा*
नरेश कुमार जोशी
बालोद/गुण्डरदेही – आजादी से पहले और वर्तमान में चलित भारतीय सिक्के और नोट की संकलन करने की ललक महेंद्र देशमुख सिकोसा जुनवानी वाले को एक नई पहचान दिला दी है जिसे नए पुराने सिक्के नोटों को सजों कर रखने का एक अनूठा परंपरा बनाकर रखा हुआ है सिक्कों और नोटों के प्रति इतने दिलचस्पी है कि उनके पिता लेख राम देशमुख के द्वारा विगत 20 साल की उम्र से सिक्का सजोने का काम कर रहे हैं । प्रति वर्ष अनुसार इस वर्ष भी गुंडरदेही में छोटा सा दुकान लगाया हुआ है जिसके माध्यम से एक पाई से लेकर 50 पैसे तक के सिक्का रखे हुए हैं इस सिक्के को देखने के लिए काफी भीड़ उनके दुकान में लगी रहती है वह लोग इन सिक्कों को देखकर पुराने जमाने को याद और ख्याल कर लेते हैं कि किस तरीके से पुराने जमाने पर कौड़ी से लेकर के पैसा और रुपया का जो प्रचलन हुआ जिसे हम वर्तमान परिवेश में हम अपने भावी पीढ़ी के लोगों को बता सकते हैं कि हमारे पूर्वज किस तरीके से आम दैनिक जीवन में रूपयों और सिक्कों का किस तरीके से प्रचलन करते थे और उनका दैनिक जीवन में उपयोग होता था। कौड़ी,आना,पैसा,सिक्कों और रूपयों को सजाने का एक अनोखी परंपरा जो एक गुण्डरदेही नगर में आकर एक छोटे से दुकान के स्वरूप में वह संचालित करके क्षेत्र के आम जनों तथा वर्तमान पीढ़ी को भारतीय रूपया व सिक्कों की अनोखी संकलन जिनको दिखाकर लोगों को भारतीय बाजार में प्रचलन के सिक्के और रुपयों को अपने पिता के मार्गदर्शन में सहेजकर एक मिशाल पेश की है। भारत के प्रचलन के सिक्के और रूपयों को संजोने की जो प्रक्रिया है जिनके माध्यम से भावी पीढ़ी को सिक्कों व रुपए के महत्व को बताया और समझाया जा सकता है।


