गुरु के वचन और शिष्य की जिज्ञासा से बनता है संवाद का सेतु : रूपेंद्र साहू
आईएसबीएम विश्वविद्यालय में गुरु पूर्णिमा व्याख्यान श्रृंखला के अन्तर्गत मंगलवार को ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु-शिष्य संवाद’ विषय पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय सांस्कृतिक विरासत में गुरु-शिष्य संबंधों की महत्ता और संवाद की परंपरा को उजागर करना था। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सामाजिक सद्भाव विभाग प्रमुख श्री रूपेंद्र साहू थे तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयं सेवक के सह जिला कार्यवाह श्री भोपेन्द्र साहू उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ आनंद महलवार ने की।
मुख्य वक्ता श्री रूपेंद्र साहू ने कहा कि भारतीय परंपरा में संवाद केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं रहा है, बल्कि यह आत्मबोध और समग्र विकास की प्रक्रिया का आधार रहा है। कबीर का उदाहरण देते हुए कहा कि कबीर गुरु के महत्वपूर्ण को न सिर्फ़ स्वीकार करते हैं बल्कि उसे श्रेष्ठता के साथ स्वीकार करते हैं। मनुष्य को पाँच रूपों में गुरु प्राप्त होते हैं। माता, पिता, शिक्षा देने वाले गुरु, दीक्षा देने वाले गुरु और परिस्थितियाँ। पहले गुरुकुल पद्धति थी और आश्रमों में दी जाने वाली शिक्षा केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें खेती, कारीगरी, युद्धकला, सेवा, अनुशासन और सह-अस्तित्व का प्रशिक्षण भी शामिल होता था।
श्री भोपेन्द्र साहू ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘गुरु’ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चेतना हैं — जो शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से चेतना की ओर ले जाते हैं। और ‘संवाद’ — वह सेतु है, जिसके माध्यम से यह ज्ञान, अनुभव और आत्मबोध शिष्य तक प्रवाहित होता है।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ आनंद महलवार ने कहा गुरु कौन है? जो जीवन भर सीखता है वही श्रेष्ठ गुरु है। कई बार प्रकृति एवं परिस्थितियाँ हमारे लिए गुरु का कार्य करती हैं। गुरु का व्यक्तित्व ही उसे श्रेष्ठ बनाता है।
धन्यवाद ज्ञापन देते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ बीपी बोल ने कहा कि गुरु सर्वत्र, सर्वज्ञ और सर्व विद्यमान है। ज्ञान, अनुभव और संस्कार को गुरु की विस्तार देता है। कार्यक्रम का संचालन हिन्दी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ दिवाकर तिवारी ने किया।


