स्वेच्छानुदान में अपनों पर मेहरबानी या जरूरतमंदों की अनदेखी? नवागढ़ में 20 लाख की सहायता राशि पर उठे सवाल!
*20 लोगों को एक-एक लाख रुपये की उपचार सहायता स्वीकृत, सोशल मीडिया पर सूची वायरल होते ही मचा घमासान; जनता पूछ रही—क्या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता आम मतदाता नहीं, बल्कि अपना राजनीतिक कुनबा है?*

नवागढ़ – जनता अपने जनप्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे उसकी आवाज बनें, विधानसभा में उसकी समस्याएं उठाएं और जरूरत के वक्त उसके साथ खड़े हों। लेकिन जब सरकारी सहायता के वितरण की सूची सामने आती है और उसमें जरूरतमंदों के चयन को लेकर ही सवाल उठने लगते हैं, तब जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर सवाल उठना लाजिमी है।
नवागढ़ विधानसभा क्षेत्र में मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए जारी एक सूची इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। सामान्य प्रशासन विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के पत्र के अनुसार मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की स्वीकृति से क्षेत्र के 20 लोगों को उपचार के लिए एक-एक लाख रुपये, यानी कुल 20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता स्वीकृत की गई है।
सरकारी दस्तावेज सोशल मीडिया पर सामने आते ही लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने सहायता राशि के चयन पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि इस सूची में भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी गई है। वहीं लोगों का सवाल है कि क्या क्षेत्र में आर्थिक रूप से कमजोर और गंभीर बीमारी से जूझ रहे जरूरतमंदों की कमी है, जिन्हें इस सहायता की वास्तविक आवश्यकता है?
*सोशल मीडिया पर जनता के सवाल, आखिर चयन का आधार क्या?*
वायरल पोस्ट पर एक यूजर ने टिप्पणी करते हुए लिखा कि गरीबों के साथ अन्याय हुआ है। वहीं गोलू कोशले नामक यूजर की टिप्पणियां भी चर्चा में हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि सूची में जिन लोगों को उपचार के नाम पर सहायता राशि मिली है, क्या वास्तव में सभी लोग बीमार हैं? उन्होंने यह भी टिप्पणी की, कि कुछ लोग राजनीतिक लाभ के लिए अपने समर्थकों को प्राथमिकता देते नजर आते हैं।
एक अन्य टिप्पणी में सहायता राशि पाने वालों की जरूरत और पात्रता को लेकर सवाल खड़े किए गए। इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि सोशल मीडिया पर लोग केवल सहायता राशि की स्वीकृति नहीं, बल्कि उसके चयन की पारदर्शिता पर जवाब चाहते हैं।
*जनप्रतिनिधियों से जनता के सीधे सवाल*
आर्थिक सहायता का उद्देश्य निश्चित रूप से जरूरतमंदों को राहत देना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सहायता राशि के लिए चयन करते समय क्षेत्र के गरीब, असहाय, गंभीर मरीजों और आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवारों को समान अवसर मिला?
क्या सहायता पाने वाले सभी लोगों की आर्थिक स्थिति और उपचार संबंधी जरूरतों का निष्पक्ष आकलन किया गया? क्या ऐसे जरूरतमंद परिवारों की सूची भी तैयार की गई, जो आर्थिक तंगी के कारण उपचार नहीं करा पा रहे हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जनता के बीच यह धारणा बन रही है कि सरकारी सहायता में राजनीतिक नजदीकियों को प्राथमिकता मिल रही है, तो जनप्रतिनिधि इस धारणा को दूर करने के लिए क्या कदम उठाएंगे?
*सत्ता का अर्थ केवल समर्थकों की चिंता नहीं, जनता की उम्मीदों का सम्मान भी है।*
जनता अपना बहुमूल्य वोट देकर जनप्रतिनिधियों को सत्ता तक पहुंचाती है। बदले में उसे उम्मीद रहती है कि उसका प्रतिनिधि बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के हर जरूरतमंद की आवाज बनेगा। यदि सहायता वितरण में पक्षपात की शिकायतें सामने आती हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच और पात्रता की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि स्वेच्छानुदान की सूची में शामिल लोगों का चयन किन मापदंडों के आधार पर हुआ और क्या आवेदन करने वाले अन्य जरूरतमंदों को भी समान अवसर दिया गया?
अब सवाल केवल 20 लाख रुपये की सहायता का नहीं, बल्कि जनविश्वास का है। आखिर नवागढ़ की जनता को अपने जनप्रतिनिधियों से जवाब कब मिलेगा? क्या सरकारी सहायता वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच रही है या फिर राजनीतिक नजदीकियां ही चयन का आधार बन रही हैं?
*जनता को आश्वासन नहीं, पारदर्शिता और जवाब चाहिए।*


