पत्रकार बंटे, प्रशासन बेफिक्र और विकास बेपटरी?
जब पत्रकारों की आवाज ही आपसी स्वार्थ में कैद हो जाए, तो भ्रष्टाचार को चुनौती कौन देगा और जनता के हक की लड़ाई आखिर कौन लड़ेगा?”
पत्रकारिता में गुटबाजी, अहंकार और राजनीतिक चाटुकारिता के बीच जनता के ज्वलंत सवाल आखिर कौन उठाएगा? क्या आपसी मनमुटाव और व्यक्तिगत स्वार्थ ने जिले की पत्रकारिता की सामूहिक आवाज को कमजोर कर दिया है?

बेमेतरा – आज की खबर उन बुद्धिजीवियों के लिए जिसमें एकता नही बल्कि वर्चस्व और अहम का घंमड की मै मेरा संगठन बडा हम बडे अखबार और चैनल चलाते है, बाकी तो बस पोर्टल वाले है। ऐसा कहने वाले को एक संदेश अच्छा लगे या बुरा लगे हकीकत है इसे स्वीकार करना ही पडेगा..
क्या पत्रकारिता अब मिशन के बजाय व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और प्रभाव का माध्यम बनती जा रही है? क्या पत्रकारों के बीच आपसी मनमुटाव, गुटबाजी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति ने भ्रष्टाचारियों को खुली छूट दे दी है? क्या राजनीतिक चाटुकारिता के दबाव में जनहित के मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल, जब सवाल पूछने वाले ही खामोश हो जाएं, तो प्रशासनिक जवाबदेही आखिर कौन तय करेगा?
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसकी जिम्मेदारी केवल खबर प्रकाशित करना या कैमरे के सामने सवाल पूछना नहीं, बल्कि सत्ता, प्रशासन और व्यवस्था को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना भी है। लेकिन क्या आज जिले की पत्रकारिता अपने इसी मूल उद्देश्य पर खरी उतर पा रही है?
आशा, उम्मीद और फिर निराशा! आखिर इस स्थिति की वजह क्या है? क्या पेशेवर बुद्धिजीवियों के बीच आपसी फूट, अहंकार और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं पत्रकारिता की सामूहिक शक्ति को कमजोर नहीं कर रही हैं?
विडंबना देखिए, जिस पत्रकार से समाज निष्पक्षता, साहस और एकजुटता की अपेक्षा करता है, वही यदि अपने साथी पत्रकार को सम्मान देने में संकोच करने लगे, तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता कैसे कायम रहेगी? क्या पत्रकारों की योग्यता अब उनके काम से नहीं, बल्कि उनके गुट, संपर्क और राजनीतिक नजदीकियों से तय होने लगी है?
क्या अपने खेमे के पत्रकार की गलती भी अनदेखी और दूसरे खेमे के पत्रकार की अच्छी खबर भी नजरअंदाज करना ही पत्रकारिता का नया चलन बनता जा रहा है?
क्या राजनीतिक नजदीकियां पत्रकारिता के स्वाभिमान पर भारी पड़ रही हैं?
क्या जनप्रतिनिधियों की प्रशंसा और राजनीतिक चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती खबरें ही पत्रकारिता का उद्देश्य रह गया है? क्या सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत जानने के लिए पत्रकारों में पहले जैसा साहस बचा है? क्या योजनाओं में अनियमितता, पात्र हितग्राहियों की उपेक्षा, सरकारी धन के उपयोग और विभागीय लापरवाही पर सवाल पूछने से परहेज किया जा रहा है?
यदि किसी योजना का लाभ वास्तविक हितग्राही तक नहीं पहुंच रहा, यदि सड़कें बनने के बाद भी बदहाल हैं, यदि सरकारी कार्यालयों में आम आदमी की सुनवाई नहीं हो रही और यदि शिकायतों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई से बच रहे हैं, तो क्या इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाना पत्रकारिता का दायित्व नहीं है?
फिर इन सवालों पर खामोशी क्यों? क्या राजनीतिक समीकरण बिगड़ने का डर है? क्या अधिकारियों से संबंध खराब होने की आशंका है? या फिर पत्रकारिता के स्वाभिमान पर व्यक्तिगत हित हावी हो चुके हैं?
पत्रकारों के बीच दूरी, अधिकारियों के लिए राहत?
क्या पत्रकारों की आपसी गुटबाजी का लाभ उन अधिकारियों और कर्मचारियों को नहीं मिल रहा, जो अपनी जिम्मेदारियों से बचते हुए व्यवस्था को मनमाने ढंग से चलाना चाहते हैं?
क्या प्रशासनिक कार्यालयों में पत्रकारों के प्रति अलग-अलग व्यवहार और उपेक्षापूर्ण रवैये पर कभी सामूहिक सवाल उठाया गया? क्या किसी पत्रकार को उसके गुट, पहचान या राजनीतिक संपर्क के आधार पर महत्व देना और दूसरे को नजरअंदाज करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप है?
जब पत्रकारों की आवाज अलग-अलग दिशाओं में बंट जाए, तो क्या प्रशासनिक जवाबदेही कमजोर नहीं होगी? जब भ्रष्टाचार और लापरवाही के मुद्दों पर एकजुट होकर सवाल उठाने की क्षमता ही कमजोर पड़ जाए, तो क्या जिम्मेदारों के हौसले बुलंद नहीं होंगे?
आखिर पत्रकारों के स्वाभिमान की रक्षा कौन करेगा? क्या पत्रकारों को सम्मान पाने के लिए किसी राजनीतिक व्यक्ति या प्रशासनिक अधिकारी की कृपा का मोहताज होना चाहिए?
विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती दूरी का जिम्मेदार कौन?
जिले में विकास के दावे तो लगातार किए जाते हैं, लेकिन क्या उन दावों की वास्तविकता का निष्पक्ष मूल्यांकन हो रहा है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कें, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार, किसानों की समस्याएं और सरकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक पहुंचने की स्थिति पर पर्याप्त सवाल उठ रहे हैं?
क्या जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी अपनी जवाबदेही का निर्वहन पूरी गंभीरता से कर रहे हैं? क्या शिकायतों का समय पर निराकरण हो रहा है? क्या विभागीय निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित नहीं रह गए हैं? क्या योजनाओं के क्रियान्वयन और सरकारी खर्च की नियमित समीक्षा हो रही है?
यदि धरातल पर समस्याएं बरकरार हैं और जिम्मेदार विभागों की निष्क्रियता पर प्रभावी सवाल नहीं उठ रहे, तो क्या विकास की रफ्तार प्रभावित होना स्वाभाविक नहीं है?
लेकिन क्या इसका दोष केवल प्रशासन पर डालकर पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती है?
अब आत्ममंथन का समय नहीं आ गया है?
क्या पत्रकारिता की असली पहचान किसी संगठन, पद, गुट या राजनीतिक नजदीकी से होती है? क्या किसी पत्रकार का सम्मान दूसरे पत्रकार को अपमानित करके बढ़ाया जा सकता है? क्या व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा को जनहित से ऊपर रखना उचित है?
क्या जिले के पत्रकार एक साझा मंच पर आकर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और जनसमस्याओं के विरुद्ध निष्पक्ष आवाज बुलंद नहीं कर सकते? क्या मतभेदों के बावजूद पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों पर एकजुट होना असंभव है?
आखिर कब तक पत्रकार एक-दूसरे की खबरों और उपलब्धियों को नजरअंदाज करते रहेंगे? कब तक व्यक्तिगत मनमुटाव के कारण सामूहिक मुद्दे पीछे छूटते रहेंगे? कब तक राजनीतिक चाटुकारिता को निष्पक्ष पत्रकारिता के सामने जगह मिलती रहेगी?
क्या पत्रकारिता का स्वाभिमान केवल सम्मान समारोहों, प्रेस कार्ड और पदों तक सीमित रह गया है, या फिर जनता के सवालों पर सत्ता और प्रशासन से जवाब मांगने का साहस भी इसमें शेष है?
याद रखिए, पत्रकार का सम्मान किसी अधिकारी की मेहरबानी नहीं, किसी नेता की कृपा नहीं और किसी संगठन के पद की जागीर भी नहीं है। उसका वास्तविक सम्मान उसकी निष्पक्ष कलम, निर्भीक सवालों और जनहित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से तय होता है।
आखिर पत्रकारिता का उद्देश्य एक-दूसरे से आगे निकलना है या जनता की समस्याओं का समाधान सुनिश्चित कराना?
यदि पत्रकार ही आपसी दीवारें खड़ी कर लेंगे, तो जनता की आवाज कौन बनेगा? यदि पत्रकार ही सवालों से समझौता कर लेंगे, तो प्रशासन को जवाबदेह कौन बनाएगा? और यदि राजनीतिक चाटुकारिता निष्पक्षता पर हावी हो जाएगी, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता आखिर बचेगी कैसे?
क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि पत्रकार पहले अपनी आपसी दूरियां खत्म करें, अपने स्वाभिमान को पहचानें और किसी भी राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक प्रभाव से मुक्त होकर जनता के सवालों को प्राथमिकता दें?
क्योंकि सवाल केवल पत्रकारों की एकता का नहीं, जिले के भविष्य का भी है। आखिर जनता को विकास के दावे चाहिए या धरातल पर विकास? आश्वासन चाहिए या जवाबदेही? और सबसे अहम सवाल—जब कलम ही खामोश हो जाए, तो व्यवस्था को आईना कौन दिखाएगा?


