सरकारी स्कूल में पत्रकारों की एंट्री पर ‘परमिशन’ का पहरा क्यो?
स्कूल सरकारी, शिक्षक सरकारी… फिर खबर कवरेज के लिए अनुमति किसकी? DEO-BEO के जवाबों में कथित विरोधाभास ने बढ़ाई उलझन
*खपरी (01) के प्रधान पाठक के रवैये से उठा बड़ा सवाल—क्या शिक्षा विभाग को सवाल पूछती कलम से परेशानी है?*

नवागढ़ – सरकारी स्कूल… सरकारी भवन… सरकारी शिक्षक… सरकारी संसाधन… और इन सबका संचालन जनता के पैसे से। फिर उसी सरकारी स्कूल में यदि कोई पत्रकार शिक्षा व्यवस्था की हकीकत जानने पहुंचे तो क्या उसे पहले किसी अधिकारी से अनुमति लेनी होगी? अगर हां, तो आदेश किसने जारी किया? और अगर ऐसा कोई लिखित आदेश नहीं है, तो पत्रकारों को अनुमति लेने की बात आखिर किस आधार पर कही जा रही है?
नवागढ़ शैक्षणिक विकासखंड के खपरी (01) स्थित शासकीय स्कूल से सामने आए घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। स्कूल के प्रधान पाठक लक्ष्मण लाल साहू के कथित व्यवहार और पत्रकारों के स्कूल प्रवेश को लेकर कही गई बातों ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
सबसे बड़ा सवाल : आदेश है तो दिखाइए!
पत्रकारों ने जब मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी अभय जायसवाल और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी हितेंद्र कुमार बंजारे से चर्चा की, तो पत्रकारों के अनुसार मिले जवाबों में स्पष्टता को लेकर सवाल खड़े हुए।
अब शिक्षा विभाग से सीधा सवाल है—
क्या पत्रकारों को सरकारी स्कूल में समाचार संकलन के लिए पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है?
यदि हां, तो—
किस नियम के तहत?
किस अधिकारी के आदेश से?
आदेश क्रमांक क्या है?
क्या यह आदेश लिखित रूप में जारी हुआ है?
क्या पूरे जिले के सभी सरकारी स्कूलों पर यह व्यवस्था लागू है?
और यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है, तो फिर पत्रकारों को अनुमति की बात किस आधार पर कही जा रही है?
पत्रकारों पर रोक… आखिर क्यों?
पत्रकार किसी निजी संस्थान में नहीं, बल्कि सरकारी स्कूल में सार्वजनिक व्यवस्था की जानकारी लेने पहुंचते हैं। स्कूल में शिक्षक समय पर पहुंच रहे हैं या नहीं, बच्चों को सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं, भवन की स्थिति कैसी है, शौचालय और पेयजल की व्यवस्था कैसी है—ये सभी सवाल सीधे तौर पर जनता से जुड़े हैं।
ऐसे में पत्रकारों के प्रवेश को लेकर यदि कोई प्रतिबंध है तो उसकी स्पष्ट नियमावली सामने आनी चाहिए।
क्योंकि सवाल यह नहीं है कि पत्रकार को स्कूल में जाने दिया गया या नहीं।
सवाल यह है कि सरकारी व्यवस्था की खबर जनता तक पहुंचाने के लिए पत्रकार को किसकी अनुमति का मोहताज बनाया जा रहा है?
प्रधान पाठक के रवैये पर भी सवाल
खपरी (01) स्कूल के प्रधान पाठक भूषण लाल साहू के कथित व्यवहार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। शिक्षक समाज में अनुशासन और मर्यादा का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में पत्रकारों के साथ संवाद के दौरान यदि कोई असहज स्थिति बनी है, तो शिक्षा विभाग को इसकी वास्तविकता स्पष्ट करनी चाहिए।
क्या विभाग ने प्रधान पाठक से इस संबंध में स्पष्टीकरण लिया?
क्या संकुल समन्वयक बसंत कुमार साहू को मामले की जानकारी है?
क्या ब्लॉक शिक्षा कार्यालय ने कोई रिपोर्ट मांगी है?
इन सवालों का जवाब भी सार्वजनिक होना चाहिए।
DEO से सवाल
अभय जायसवाल बताएं—
सरकारी स्कूल में पत्रकार प्रवेश के लिए अनुमति अनिवार्य है या नहीं?
यदि अनिवार्य है तो आदेश की प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं?
क्या पत्रकारों के लिए कोई अलग विभागीय प्रोटोकॉल जारी किया गया है?
क्या प्रधान पाठक पत्रकारों को प्रवेश से रोक सकते हैं?
BEO से सवाल
हितेंद्र कुमार बंजारे बताएं—
नवागढ़ ब्लॉक में पत्रकारों के स्कूल प्रवेश की क्या व्यवस्था है?
खपरी (01) स्कूल में पत्रकारों से अनुमति की बात किस नियम के आधार पर कही गई?
क्या इस संबंध में कोई लिखित निर्देश जारी हुआ है?
DEO और BEO स्तर से स्पष्ट एवं एक समान जवाब क्यों नहीं मिल पा रहा?
संकुल समन्वयक से सवाल
बसंत कुमार साहू की जिम्मेदारी क्या?
यदि स्कूल स्तर पर पत्रकारों के प्रवेश और व्यवहार को लेकर विवाद की स्थिति बनी, तो संकुल स्तर पर इसकी जानकारी ली गई या नहीं?
क्या संकुल समन्वयक ने स्कूल से रिपोर्ट मांगी?
क्या विभागीय नियमों की जानकारी प्रधान पाठक को दी गई थी?
शिक्षा मंत्री से भी सवाल
गजेंद्र यादव के विभाग में मीडिया के लिए नियम क्या हैं?
प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग से यह स्पष्ट होना चाहिए कि सरकारी स्कूलों में पत्रकारों के समाचार संकलन को लेकर एक समान, पारदर्शी और लिखित व्यवस्था क्या है।
यदि पत्रकारों के प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है, तो विभागीय अधिकारी और स्कूल स्तर पर ऐसी अनुमति की बात क्यों सामने आती है?
और यदि प्रतिबंध है, तो उसका आधार क्या है?
सवाल स्कूल का नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता का है
सरकारी स्कूल जनता के लिए बने हैं। वहां पढ़ने वाले बच्चे जनता के हैं, शिक्षक जनता के वेतन से भुगतान पाते हैं और स्कूल की व्यवस्था भी सार्वजनिक धन से संचालित होती है।
ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाना पत्रकारिता का हिस्सा है।
पत्रकार सवाल पूछे तो जवाब मिलना चाहिए, अनुमति की दीवार नहीं।
अगर व्यवस्था बेहतर है तो खबर से डर कैसा?
और अगर कहीं कमी है तो उसे सामने आने से रोकने के बजाय सुधारने की जरूरत है।
अब गेंद शिक्षा विभाग के पाले में है—
पत्रकारों के स्कूल प्रवेश को लेकर वास्तविक नियम क्या है?
क्या कोई लिखित आदेश मौजूद है?
यदि है तो सार्वजनिक कीजिए।
यदि नहीं है तो मौखिक ‘परमिशन व्यवस्था’ किसने बनाई?
जवाब शिक्षा विभाग को देना होगा।


