डीएपी के नाम पर किसानों से छल का आरोप, फिर कार्रवाई पर चुप्पी क्यों?

भारतीय किसान यूनियन ने कलेक्टर को सौंपे पत्र में बैजी में कथित नकली डीएपी बिक्री की जांच, नुकसान का मुआवजा और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की
बेमेतरा। किसानों के खेत में डाली जाने वाली खाद अगर कथित तौर पर नकली निकले, तो नुकसान सिर्फ एक बोरी खाद का नहीं, बल्कि पूरी फसल और किसान की मेहनत का होता है। बेमेतरा जिले के ग्राम बैजी में किसानों को नकली डीएपी खाद बेचने के आरोप को लेकर भारतीय किसान यूनियन छत्तीसगढ़ के जिला अध्यक्ष एडवोकेट किशोर कुमार टंडन ने 7 सितंबर 2026 को कलेक्टर के नाम शिकायत पत्र सौंपकर मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
पत्र में आरोप लगाया गया है कि किसानों को डीएपी के नाम पर कथित रूप से ऐसा खाद बेचा गया, जिसके उपयोग से किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। शिकायतकर्ता ने कृषि एवं राजस्व विभाग की संयुक्त टीम गठित कर मौके पर किसानों से पूछताछ, खाद के नमूनों की जांच और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
गौर करने वाली बात यह है कि बेमेतरा प्रशासन पहले भी उर्वरक की कालाबाजारी, अवैध भंडारण और नियमों के उल्लंघन के खिलाफ निरीक्षण व कार्रवाई की बात सार्वजनिक रूप से कह चुका है। जून 2026 में जिले के 132 उर्वरक केंद्रों के निरीक्षण, 19 विक्रेताओं को नोटिस तथा कुछ केंद्रों पर प्रतिबंध और लाइसेंस निलंबन की कार्रवाई की जानकारी भी सामने आई थी।
अब असली सवाल यही है—बैजी के किसानों की शिकायत पर आगे क्या हुआ?
क्या शिकायत के बाद खाद के नमूने लिए गए?
क्या उनकी प्रयोगशाला जांच कराई गई?
अगर खाद अमानक या नकली पाई जाती है तो किसानों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
और यदि आरोप गलत हैं, तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर किसानों को वास्तविकता बताने की पहल क्यों नहीं की जा रही?
सबसे बड़ा सवाल उन जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं से भी है, जो मंचों से स्वयं को किसान हितैषी बताते हुए किसानों के बीच जननायक की छवि बनाते हैं—जब किसान के साथ खाद के नाम पर कथित छल का मामला सामने आता है, तब उसकी आवाज जिम्मेदार मंचों तक पहुंचाने और जांच की मांग को अंजाम तक पहुंचाने में सक्रियता कहां दिखाई देती है?
किसान के लिए खाद सिर्फ एक कृषि सामग्री नहीं, बल्कि उसकी पूरी फसल की उम्मीद है। इसलिए बैजी मामले में आरोप सही हैं या गलत—इसका फैसला आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, निष्पक्ष जांच और वैज्ञानिक परीक्षण से होना चाहिए।
जिला प्रशासन के सामने अब सवाल यही है—शिकायत पत्र फाइल में रहेगा या किसानों को जांच की स्पष्ट रिपोर्ट और कार्रवाई का जवाब भी मिलेगा?
**किसान हित की बात सिर्फ भाषणों में नहीं, कार्रवाई में दिखाई देनी चाहिए।**


