दीपावली पर कर्मचारियों के घर अंधेरा क्यों? वेतन देने के आदेश के बावजूद बसनी समिति के कर्मचारी वेतन से वंचित क्यों?
किसानों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाले समिति कर्मचारी खुद आर्थिक तंगी और बेबसी में दीपावली मनाने को मजबूर क्यों? प्रभारी समिति प्रबंधक की लापरवाही या विभागीय अधिकारियों की मेहरबानी? आखिर किसके इशारे पर अटका है कर्मचारियों का वेतन?

बेमेतरा। एक तरफ पूरा देश दीपावली के पावन पर्व पर खुशियां बांटने, घरों को रोशन करने और अपनों के सपनों को पूरा करने की तैयारी में जुटा है, तो दूसरी तरफ बसनी सेवा सहकारी समिति के कर्मचारी अपने ही मेहनत के वेतन के लिए दर-दर उम्मीद लगाए क्यों बैठे हैं? क्या दीपावली की खुशियों पर उनका और उनके परिवार का कोई अधिकार नहीं है? क्या परिवार के बच्चों की उम्मीदें, घर की जरूरतें और त्योहार की तैयारियां उनके लिए मायने नहीं रखतीं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कर्मचारियों को वेतन देने के लिए विभागीय आदेश जारी होने की बात कही जा रही है, तो आखिर भुगतान क्यों नहीं हो रहा है? प्रभारी समिति प्रबंधक, शाखा प्रबंधक, प्राधिकृत अधिकारी अध्यक्ष और नोडल अधिकारी लगातार वेतन भुगतान की बात कर रहे हैं, तो फिर वास्तविकता में कर्मचारियों के खाते खाली क्यों हैं? क्या आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं? या फिर आदेश के पालन में जानबूझकर देरी की जा रही है?
आखिर किसके इशारे पर अटका है कर्मचारियों का वेतन?
क्या प्रभारी समिति प्रबंधक की लापरवाही कर्मचारियों की परेशानी का कारण है? यदि ऐसा है, तो विभागीय आदेश के बावजूद वेतन भुगतान नहीं करने पर जवाबदेही क्यों तय नहीं की जा रही है? क्या संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं है? यदि जानकारी है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति दिखाई नहीं दे रही है?
क्या शाखा प्रबंधक, नोडल अधिकारी और प्राधिकृत अधिकारी अध्यक्ष केवल आश्वासन देने तक अपनी जिम्मेदारी सीमित मान रहे हैं? आखिर वेतन भुगतान की प्रक्रिया में बाधा कहां है? क्या कोई लिखित आपत्ति है? क्या वित्तीय या तकनीकी अड़चन है? यदि कोई समस्या है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है?
और यदि कोई बाधा नहीं है, तो कर्मचारियों का वेतन रोकने की वजह क्या है?
किसानों की सेवा करने वाले कर्मचारी खुद बेबस क्यों?
छत्तीसगढ़ सरकार की महत्वाकांक्षी समर्थन मूल्य पर धान खरीदी योजना को सफल बनाने में सेवा सहकारी समितियों के कर्मचारियों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, क्या इसे नजरअंदाज किया जा सकता है? किसानों के पंजीयन से लेकर धान खरीदी और पूरी व्यवस्था के संचालन तक जिम्मेदारी निभाने वाले कर्मचारी आज खुद अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए परेशान क्यों हैं?
क्या सैकड़ों किसानों के चेहरों पर मुस्कान लाने वाले कर्मचारियों के अपने घरों में दीपावली की खुशियां नहीं होनी चाहिए? क्या उनकी मेहनत का उचित मूल्य समय पर मिलना उनका अधिकार नहीं है?
लापरवाही पर कार्रवाई से विभाग को परहेज क्यों?
यदि प्रभारी समिति प्रबंधक की लापरवाही या विभागीय आदेशों की अवहेलना के कारण वेतन भुगतान लंबित है, तो संबंधित व्यक्ति पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? क्या विभागीय अधिकारियों को कार्रवाई करने में किसी प्रकार का दबाव महसूस हो रहा है? क्या जिम्मेदारों के राजनीतिक संपर्क या प्रभावशाली लोगों से नजदीकियां कार्रवाई के रास्ते में बाधा बन रही हैं? या फिर विभागीय व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की इच्छाशक्ति ही समाप्त हो चुकी है?
क्या किसी कर्मचारी का वेतन रोकने की जिम्मेदारी तय करना इतना मुश्किल है? क्या विभागीय नियम सभी के लिए समान नहीं होने चाहिए? आखिर छोटे कर्मचारियों से समय पर काम और अनुशासन की अपेक्षा करने वाले अधिकारी खुद अपनी जिम्मेदारी कब निभाएंगे?
आखिर कब तक आश्वासनों के सहारे जिएंगे कर्मचारी?
क्या बसनी समिति के कर्मचारियों को इस दीपावली भी निराशा ही मिलेगी? क्या उनके बच्चों के त्योहार के सपने अधूरे रह जाएंगे? क्या परिवार की जरूरतों और आर्थिक तंगी के बीच उन्हें अपनी मेहनत का पैसा पाने के लिए और इंतजार करना पड़ेगा?
आखिर वेतन देने का आदेश होने के बावजूद वेतन रोकने वाला कौन है? जिम्मेदार कौन है? जवाबदेही किसकी है? और कार्रवाई कब होगी?
क्या दीपावली पर दूसरों के घरों में खुशियां पहुंचाने वाली धान खरीदी व्यवस्था के कर्मचारियों के अपने घरों में भी दीप जल पाएंगे? या फिर विभागीय लापरवाही और जिम्मेदारों की उदासीनता उनके परिवार की खुशियों पर अंधेरा डालती रहेगी?
क्या इंसानियत और मानवीय संवेदनाएं केवल भाषणों और शुभकामना संदेशों तक सीमित रह गई हैं? आखिर मेहनत करने वाले कर्मचारियों को उनकी मेहनत का पैसा मांगने के लिए इतना मजबूर क्यों होना पड़ रहा है?
अब सवाल केवल वेतन भुगतान का नहीं, बल्कि विभागीय जवाबदेही, कर्मचारियों के सम्मान और मानवीय संवेदनाओं का भी है। क्या जिम्मेदार अधिकारी दीपावली से पहले लंबित वेतन भुगतान सुनिश्चित कराएंगे? या फिर कर्मचारी इस बार भी आश्वासनों की रोशनी में ही त्योहार मनाने को मजबूर होंगे?


