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November 6, 2026 11:56 pm

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सनातन मर्यादा का प्रतीक

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धान खरीदी से पहले भूसी के नाम पर कथित फर्जी बिल का मामला गरमाया, समिति कर्मचारियों ने खोला मोर्चा

धान खरीदी से पहले भूसी के नाम पर कथित फर्जी बिल का मामला गरमाया, समिति कर्मचारियों ने खोला मोर्चा

 

*9 महीने से वेतन नहीं मिलने का आरोप, परिवार के भरण-पोषण पर संकट; जांच कर दोषियों पर कार्रवाई और प्रभारी समिति प्रबंधक की बर्खास्तगी की मांग*

**बेमेतरा-** धान खरीदी शुरू होने से पहले ही सेवा सहकारी समिति मर्यादित ओड़िया, शाखा कठेरा में कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आने से सहकारिता व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। समिति के कर्मचारियों ने भूसी एवं अन्य मदों के नाम पर फर्जी बिल पास किए जाने का आरोप लगाते हुए मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग उठाई है। कर्मचारियों का आरोप है कि समिति में कथित अनियमितताओं का खामियाजा उन्हें और उनके परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। सबसे गंभीर स्थिति यह है कि कर्मचारियों को लंबे समय से वेतन नहीं मिलने के कारण रोजमर्रा का जीवन चलाना मुश्किल हो गया है।

 

*क्या धान खरीदी से पहले ही समिति के वित्तीय लेन-देन की जांच जरूरी नहीं?*

 

समिति कर्मचारियों द्वारा जिला नोडल अधिकारी, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित, दुर्ग को 27 अक्टूबर 2026 को सौंपे गए आवेदन में समिति के कामकाज और वित्तीय लेन-देन पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आवेदन के अनुसार, समिति मर्यादित ओड़िया, पंजीयन क्रमांक 469, शाखा कठेरा में समिति संचालन का कार्य ठीक तरीके से नहीं होने और प्रभारी समिति प्रबंधक के नियमित रूप से अनुपस्थित रहने का आरोप लगाया गया है।

 

कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि भूसी के नाम पर कथित फर्जी बिल निकाले गए हैं। आवेदन में 4 लाख रुपये, 1 लाख 62 हजार रुपये तथा 1 लाख 5 हजार रुपये के बिलों का उल्लेख किया गया है। इन बिलों की वास्तविकता, भुगतान की स्थिति, सामग्री की आपूर्ति और संबंधित दस्तावेजों की जांच अब महत्वपूर्ण हो गई है।

 

**सवाल यह है कि यदि बिलों में अनियमितता हुई है, तो क्या संबंधित अभिलेखों का मिलान कर भुगतान की वास्तविकता सामने नहीं लाई जानी चाहिए?** क्या बिलों के आधार, स्वीकृति प्रक्रिया, सामग्री की उपलब्धता और भुगतान करने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी? हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

 

*9 महीने से वेतन नहीं, परिवार का खर्च चलाना बना चुनौती*

 

इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू समिति कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति है। कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें करीब 9 महीने से वेतन नहीं मिला है। वे नियमित रूप से अपने काम और जिम्मेदारियों को निभाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वेतन के अभाव में घर चलाना, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना, राशन खरीदना और अन्य जरूरी जरूरतें पूरी करना कठिन होता जा रहा है।

 

कर्मचारी आखिर कब तक बिना वेतन के काम करते रहेंगे? परिवार की जिम्मेदारी निभाने वाले कर्मचारियों को यदि महीनों तक पारिश्रमिक नहीं मिलता, तो उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा होना स्वाभाविक है। समय पर वेतन नहीं मिलने से कर्मचारियों की मानसिक परेशानी और भविष्य की चिंता भी बढ़ती है।

 

**क्या सहकारी व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने वाले कर्मचारियों की आजीविका सुनिश्चित करना संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों का दायित्व नहीं है?** यदि वेतन भुगतान में किसी प्रकार की वित्तीय या प्रशासनिक बाधा है, तो उसका स्पष्ट कारण बताकर समाधान निकालना जरूरी है।

 

*कर्मचारियों ने प्रभारी समिति प्रबंधक पर कार्रवाई की मांग की*

 

आवेदन में कर्मचारियों ने कथित फर्जी बिलों की जांच कर दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है। कर्मचारियों का कहना है कि जांच में आरोप प्रमाणित होने पर संबंधित प्रभारी समिति प्रबंधक के विरुद्ध बर्खास्तगी सहित नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, समिति के वित्तीय अभिलेखों की जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि कथित बिल किस आधार पर बनाए गए, किसने उन्हें स्वीकृत किया और भुगतान की प्रक्रिया में किन लोगों की भूमिका रही।

 

कर्मचारियों द्वारा आवेदन के साथ हस्ताक्षरयुक्त सूची भी संलग्न किए जाने का उल्लेख है। इससे मामले को लेकर कर्मचारियों की सामूहिक चिंता सामने आती है। अब देखना यह होगा कि जिला नोडल अधिकारी और संबंधित सहकारी बैंक प्रबंधन इस शिकायत को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

 

*धान खरीदी से पहले कार्रवाई होगी या शिकायत फाइलों में ही सिमट जाएगी?*

 

धान खरीदी का समय नजदीक होने के बीच समिति के वित्तीय लेन-देन और प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। धान खरीदी से जुड़े कार्यों में पारदर्शिता, रिकॉर्ड का सही रखरखाव और वित्तीय अनुशासन बेहद जरूरी हैं। यदि किसी प्रकार की अनियमितता हुई है, तो समय रहते जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए, ताकि किसानों, समिति और कर्मचारियों के हित प्रभावित न हों।

 

अब जिम्मेदार अधिकारियों के सामने कई अहम सवाल हैं—क्या कथित फर्जी बिलों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या संबंधित दस्तावेजों और भुगतान का भौतिक सत्यापन कराया जाएगा? क्या कर्मचारियों को बकाया वेतन दिलाने के लिए समयबद्ध कदम उठाए जाएंगे? और यदि जांच में वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है, तो क्या जिम्मेदार व्यक्तियों पर नियमानुसार कठोर कार्रवाई होगी?

 

**कर्मचारियों को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जांच, जवाबदेही और वेतन भुगतान के रूप में ठोस राहत चाहिए।*

 

* मामले में आरोपों की निष्पक्ष जांच, संबंधित पक्ष का जवाब और कार्रवाई की स्थिति सामने आने के बाद ही पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

 

*खबर को और प्रभावी बनाने के लिए संभावित मुख्य सवाल*

 

* बिल किसने बनाया, किसने पास किया और भुगतान किसे हुआ?

 

* 9 महीने से वेतन क्यों रुका है, जिम्मेदार कौन है?

 

* धान खरीदी से पहले समिति के रिकॉर्ड का विशेष ऑडिट होगा या नहीं?

 

* जांच में आरोप प्रमाणित होने पर क्या दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार बर्खास्तगी और वसूली की कार्रवाई होगी?

Binod Kumar
Author: Binod Kumar

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