तालाब, नदी और नरवा से निकली मिट्टी-मुरुम आखिर गई कहां? जनहित के नाम पर खुदाई, लेकिन शासकीय भवनों तक नहीं पहुंची मिट्टी ?
बेमेतरा जिले में पंचायत, राजस्व और खनिज विभाग की भूमिका पर सवाल; खुदाई से निकले खनिज की मात्रा, परिवहन और उपयोग की जांच जरूरी

बेमेतरा। गर्मी के दिनों में तालाबों, नदियों और नरवा में जलभराव क्षमता बढ़ाने तथा जनहित के कार्यों के नाम पर मिट्टी और मुरुम की खुदाई की जाती है। जनप्रतिनिधियों की ओर से कई बार इसे जनहित में किया जा रहा कार्य बताया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि खुदाई से निकली मिट्टी और मुरुम का वास्तविक उपयोग कहां हुआ? क्या इसका उपयोग शासकीय निर्माण कार्यों में किया गया या फिर परिवहन कर कहीं और भेज दिया गया?
बेमेतरा जिले में इस विषय को लेकर जांच की जरूरत महसूस होती है। सामने आई तस्वीर में एक निर्माणाधीन ढांचा दिखाई दे रहा है, जिसके आसपास मिट्टी और घास-झाड़ियां नजर आ रही हैं। तस्वीर के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि यहां किसी भी प्रकार की मिट्टी नहीं डाली गई है, लेकिन यदि संबंधित निर्माण स्थल पर मिट्टी की आवश्यकता थी और जनहित के कार्यों से निकली मिट्टी उपलब्ध होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं हुआ, तो इसकी जांच होनी चाहिए।
जनहित के नाम पर खुदाई, उपयोग का हिसाब कौन देगा?
यदि तालाब, नदी या नरवा से मिट्टी-मुरुम निकालने की अनुमति अथवा कार्ययोजना बनाई गई थी, तो संबंधित विभागों के पास खुदाई की मात्रा, परिवहन, उपयोग और शेष सामग्री का रिकॉर्ड होना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि निकाली गई सामग्री का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप हुआ या नहीं।
यदि मिट्टी-मुरुम का उपयोग शासकीय निर्माण कार्यों में किया जाना था, तो किन भवनों, सड़कों अथवा अन्य विकास कार्यों में कितनी मात्रा पहुंचाई गई, इसका विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वहीं, यदि सामग्री निजी भूमि या अन्य स्थानों पर ले जाई गई, तो उसके लिए लागू अनुमति और रॉयल्टी संबंधी प्रावधानों की भी जांच आवश्यक है।
पंचायत, राजस्व और खनिज विभाग की जवाबदेही
ग्राम पंचायत: खुदाई का प्रस्ताव, ग्रामसभा की भूमिका, कार्य की स्वीकृति, खर्च और मिट्टी-मुरुम के उपयोग से संबंधित अभिलेखों की जांच होनी चाहिए।
राजस्व विभाग: संबंधित भूमि की प्रकृति, खुदाई की अनुमति, सीमांकन और शासकीय भूमि से निकाली गई सामग्री के उपयोग की वैधता की जांच की जानी चाहिए।
खनिज विभाग: मिट्टी-मुरुम की खुदाई, लागू अनुमति, परिवहन दस्तावेज, रॉयल्टी तथा अवैध उत्खनन या परिवहन की संभावना की जांच की जानी चाहिए।
जांच के बाद ही सामने आएगी वास्तविकता
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि लंबे समय से तालाबों, नदियों और नरवा से मिट्टी-मुरुम निकाली जा रही है, तो उसकी कुल मात्रा कितनी है और उसका उपयोग कहां-कहां किया गया? क्या संबंधित विभागों ने मौके पर जाकर सत्यापन किया? क्या खुदाई और परिवहन का रिकॉर्ड उपलब्ध है? यदि जनहित के नाम पर निकाली गई सामग्री का उपयोग निर्धारित कार्य में नहीं हुआ, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
अब आवश्यकता है कि जिला प्रशासन बेमेतरा संबंधित ग्राम पंचायतों, राजस्व विभाग और खनिज विभाग से रिकॉर्ड तलब कर निष्पक्ष जांच कराए। खुदाई की मात्रा, परिवहन, उपयोग और शासकीय निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति का मिलान किया जाए, ताकि स्पष्ट हो सके कि जनहित के नाम पर निकली मिट्टी-मुरुम का लाभ जनता को मिला या उसके उपयोग को लेकर गंभीर सवाल अनुत्तरित हैं।


