गायत्री हॉस्पिटल मामला: तीन महीने से फाइलों में कार्रवाई कैद, जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठे सवाल!
स्वास्थ्य से जुड़ी शिकायत पर भी प्रशासन की ‘नींद’ नहीं खुली? महिला डॉक्टर ने जताया दस्तावेजों में फर्जीवाड़े का संदेह, शिकायत के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
कौन रोक रहा है कार्रवाई? जिम्मेदार अधिकारी जवाब दें—जनता के स्वास्थ्य से जुड़े मामले में तीन महीने की खामोशी आखिर किस मजबूरी में?
बेमेतरा। गायत्री हॉस्पिटल से जुड़े विवाद और दस्तावेजों को लेकर सामने आई शिकायत ने एक बार फिर जिले के स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता महिला डॉक्टर द्वारा दस्तावेजों में कथित फर्जीवाड़े की आशंका जताते हुए जांच और कार्रवाई की मांग किए जाने के बावजूद कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने से अब सवाल सीधे जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर उठने लगे हैं।
मामला महज कागजों और फाइलों तक सीमित नहीं है। सवाल आम लोगों के स्वास्थ्य और निजी अस्पताल की जवाबदेही से जुड़ा है। ऐसे में यदि शिकायत गंभीर है तो उसकी निष्पक्ष जांच और नियमानुसार कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है?
तीन महीने में कार्रवाई नहीं तो जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि शिकायत सामने आने के बाद जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी आखिर किस स्तर पर कार्रवाई कर रहे हैं?
क्या शिकायत की जांच पूरी हुई?
अगर हुई तो जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया?
अगर कार्रवाई बनती है तो अब तक आदेश क्यों नहीं हुआ?
और अगर कार्रवाई नहीं बनती तो शिकायतकर्ता को स्पष्ट जवाब क्यों नहीं दिया गया?
स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों से यह भी पूछा जाना जरूरी है कि जनता के स्वास्थ्य से जुड़े मामले में फाइलों की गति इतनी धीमी क्यों है?
‘संचालक’ होने के दावे पर भी सवाल
गायत्री हॉस्पिटल से जुड़े पिलेश्वर आडिल के स्वयं को संचालक बताए जाने को लेकर भी सवाल सामने आए हैं। वहीं महिला डॉक्टर ने कुछ दस्तावेजों में कथित फर्जी हस्ताक्षर अथवा दस्तावेजी गड़बड़ी की आशंका जताई है। ऐसे आरोपों की वास्तविकता जांच का विषय है, लेकिन यदि शिकायत विभाग के समक्ष प्रस्तुत हो चुकी है तो दस्तावेजों की सत्यता की जांच करना किसकी जिम्मेदारी है?
क्या संबंधित दस्तावेजों का मूल रिकॉर्ड मंगाकर जांच की गई?
क्या हस्ताक्षर और संबंधित अभिलेखों का सत्यापन कराया गया?
क्या अस्पताल के संचालन से जुड़े दस्तावेजों की दोबारा जांच हुई?
और यदि जांच हुई है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक अथवा शिकायतकर्ता को उपलब्ध क्यों नहीं कराई जा रही?
‘मलाई-मिठाई’ की चर्चा, लेकिन सबूत कहां?
मामले को लेकर आम लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं जरूर हैं। कार्रवाई में देरी को लेकर ‘मलाई-मिठाई’ जैसी चर्चाएं भी अब सवालों का रूप लेने लगी हैं, लेकिन इन चर्चाओं की सत्यता बिना प्रमाण के तय नहीं की जा सकती।
ऐसे में प्रशासन के लिए सबसे उचित रास्ता यही है कि देरी का कारण स्पष्ट करे, जांच की स्थिति बताए और यदि किसी स्तर पर अनियमितता मिली है तो नियमानुसार कार्रवाई करे। इससे न केवल शिकायत पर स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि विभाग की पारदर्शिता पर भी भरोसा कायम होगा।
सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदार अधिकारी कब जागेंगे?
तीन महीने से मामला चर्चा और शिकायतों के बीच है तो आखिर जिम्मेदार अधिकारी किस कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं?
क्या किसी बड़े हादसे या गंभीर शिकायत के बाद ही प्रशासन जागेगा?
क्या स्वास्थ्य विभाग में शिकायतों के निपटारे की कोई समय-सीमा नहीं है?
क्या जिम्मेदार अधिकारी अपनी जवाबदेही तय करने को तैयार हैं?
और सबसे अहम—आम जनता के स्वास्थ्य से जुड़े मामले में कार्रवाई से ज्यादा जरूरी आखिर क्या हो सकता है?
अब निगाह जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी है। शिकायत सही है तो कार्रवाई होनी चाहिए और शिकायत गलत है तो जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए—लेकिन महीनों तक चुप्पी, दोनों ही स्थितियों में सवाल जरूर खड़े करती है।


