चिरौंजी पर व्यापक वैज्ञानिक शोध, संरक्षण और जनजातीय आजीविका को मिलेगी नई दिशा

रायपुर/जबलपुर। चिरौंजी जैसे महत्वपूर्ण लघु वनोपज एवं वन आनुवंशिक संसाधन के संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन और इससे जुड़ी जनजातीय आजीविका को सशक्त बनाने की दिशा में डॉ. अंकुर दहायत का शोध महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पहल के रूप में सामने आया है। यह शोध कार्य ट्रॉपिकल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (TFRI), जबलपुर में वन अनुसंधान संस्थान विश्वविद्यालय, देहरादून के अंतर्गत किया गया।
शोध के दौरान छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और महासमुंद तथा मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा, बैतूल और जबलपुर के प्राकृतिक वन क्षेत्रों में पाए जाने वाले चिरौंजी के वृक्षों का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। विभिन्न प्राकृतिक आबादियों से लिए गए नमूनों के आधार पर चिरौंजी की आनुवंशिक विविधता और जनसंख्या संरचना का अध्ययन किया गया।
अध्ययन में अलग-अलग प्राकृतिक आबादियों के बीच मौजूद आनुवंशिक संबंधों और विविधता से जुड़ी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त हुई। आणविक एवं जीनोमिक विश्लेषण के माध्यम से जुटाई गई जानकारी भविष्य में चिरौंजी के आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन, पुनरुत्पादन तथा सतत उपयोग के लिए रणनीति तैयार करने में उपयोगी हो सकती है।
NCBI में जमा की गई जीनोमिक जानकारी
शोध के दौरान प्राप्त महत्वपूर्ण जीनोमिक जानकारी को भविष्य के वैज्ञानिक अनुसंधान एवं संदर्भ के लिए नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन (NCBI) की सार्वजनिक रिपॉजिटरी में जमा किया गया है। शोध से संबंधित शोध-पत्र प्रतिष्ठित Springer जर्नल्स में प्रकाशित हुए हैं।
इस शोध कार्य को डॉ. नसीर मोहम्मद एवं डॉ. फातिमा शिरीन के मार्गदर्शन में पूरा किया गया। शोध की विशेषता यह रही कि अध्ययन को केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि प्राकृतिक वन क्षेत्रों में मौजूद चिरौंजी की वास्तविक आबादियों को आधार बनाकर आनुवंशिक अध्ययन किया गया। इससे क्षेत्रीय स्तर पर चिरौंजी के आनुवंशिक संसाधनों को समझने और उनके दीर्घकालीन संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार हुआ है।
जनजातीय आजीविका से जुड़ा महत्वपूर्ण वन संसाधन
चिरौंजी छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के कई वन क्षेत्रों में पाया जाने वाला महत्वपूर्ण लघु वनोपज है। इसके फल और बीज स्थानीय समुदायों की आय और आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। विशेषकर वन क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय एवं अन्य स्थानीय समुदायों के लिए इसका आर्थिक महत्व है।
डॉ. अंकुर दहायत का यह अध्ययन भविष्य में चिरौंजी की प्राकृतिक आबादियों के संरक्षण, बेहतर वैज्ञानिक प्रबंधन, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री के चयन और चिरौंजी आधारित आजीविका गतिविधियों के विकास के लिए उपयोगी आधार प्रदान कर सकता है।
सतना निवासी श्रीमती सरोज दहायत एवं श्री संतोष दहायत के सुपुत्र डॉ. अंकुर दहायत का यह शोध चिरौंजी जैसे महत्वपूर्ण वन आनुवंशिक संसाधन के वैज्ञानिक संरक्षण और सतत उपयोग की दिशा में उल्लेखनीय अकादमिक प्रयास है।


