मिठाई का सैंपल लिया, लेकिन बिक्री जारी! जांच रिपोर्ट आने तक जनता की सेहत से खिलवाड़ कौन रोकेगा?

*बेमेतरा में खाद्य सुरक्षा जांच या महज औपचारिकता? दुकानों में सैंपलिंग की कार्रवाई, मगर निगरानी और जवाबदेही पर सवाल; आखिर खाद्य सुरक्षा अधिकारी किसके लिए निभा रहे हैं अपनी जिम्मेदारी?*
बेमेतरा – त्योहार हो या आम दिन, मिठाइयों और खाद्य पदार्थों की खरीदारी करने वाला आम आदमी इस भरोसे के साथ सामान खरीदता है कि खाद्य विभाग उसकी सेहत की निगरानी कर रहा है। लेकिन बेमेतरा जिले में खाद्य पदार्थों की जांच व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवाल इस भरोसे पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।
आरोप है कि विभाग के जिम्मेदार अधिकारी कुछ चिन्हांकित दुकानों में पहुंचकर मिठाइयों के सैंपल तो लेते हैं, लेकिन सैंपल लेने के बाद संबंधित खाद्य सामग्री की बिक्री पर निगरानी और आवश्यक कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती। सवाल यह है कि यदि किसी मिठाई में मिलावट या असुरक्षित तत्व होने की आशंका है, तो जांच रिपोर्ट आने तक उसकी बिक्री जारी रहने पर विभाग की क्या जिम्मेदारी बनती है?
खाद्य सुरक्षा कानून क्या कहता है?
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 की धारा 38 के तहत खाद्य सुरक्षा अधिकारी को संदिग्ध खाद्य पदार्थ का नमूना लेने, नियमों के अनुसार खाद्य सामग्री जब्त करने तथा नमूना लेने के बाद संबंधित सामग्री को खाद्य कारोबारी की सुरक्षित अभिरक्षा में रखने का अधिकार है। निर्धारित परिस्थितियों में सामग्री पर सील लगाकर उसे नहीं बेचने का आदेश और बांड भी लिया जा सकता है।
वहीं खाद्य सुरक्षा एवं मानक नियम 2011 के नियम 2.4.1 के तहत सैंपलिंग के दौरान गवाह बुलाने, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने और खाद्य कारोबारी को निर्धारित प्रारूप में नोटिस देने जैसी प्रक्रियाएं निर्धारित हैं।
नियम 2.4.2 के अनुसार खाद्य विश्लेषक को प्रयोगशाला में सैंपल प्राप्त होने के 14 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट भेजनी होती है। यदि निर्धारित अवधि में जांच संभव नहीं है तो देरी के कारण और अतिरिक्त समय की जानकारी संबंधित अधिकारियों को देना आवश्यक है।
अब बेमेतरा के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों से सीधे सवाल—
1. जिन दुकानों से मिठाइयों के सैंपल लिए गए, क्या प्रत्येक सैंपल की विधिवत सैंपलिंग प्रक्रिया और दस्तावेजी कार्रवाई पूरी की गई?
2. सैंपल लेने के बाद संबंधित मिठाई की बिक्री जारी रखने या रोकने का निर्णय किन आधारों पर लिया गया?
3. यदि खाद्य सामग्री असुरक्षित होने की आशंका थी, तो क्या उसे जब्त कर सीलबंद किया गया या कारोबारी की सुरक्षित अभिरक्षा में रखकर बिक्री रोकने का आदेश दिया गया?
4. सैंपल की जांच रिपोर्ट कितने दिनों में आई? क्या 14 दिनों की निर्धारित समय-सीमा का पालन किया गया?
5. जांच रिपोर्ट आने तक यदि संबंधित मिठाई बिककर लोगों के पेट में पहुंच गई, तो उपभोक्ताओं की सुरक्षा की जवाबदेही किसकी होगी?
6. जिन दुकानों से सैंपल लिए गए, उनकी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? दोषी पाए जाने वालों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
7. क्या जिले में खाद्य पदार्थों की जांच निष्पक्ष और नियमित रूप से हो रही है या कार्रवाई कुछ चिन्हांकित दुकानों तक ही सीमित है?
सैंपलिंग के आंकड़े नहीं, कार्रवाई का हिसाब दीजिए साहब!
सिर्फ सैंपल लेना खाद्य सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी नहीं है। असली परीक्षा है संदिग्ध खाद्य सामग्री की बिक्री रोकना, समय पर जांच कराना, मिलावट पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई करना और उपभोक्ताओं को सुरक्षित खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना।
बेमेतरा जिले के खाद्य सुरक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए कि अब तक कितने सैंपल लिए गए, कितनी रिपोर्ट अमानक आईं, कितने दुकानदारों पर कार्रवाई हुई और कितने मामलों में केवल नोटिस देकर मामला समाप्त कर दिया गया?
आखिर जनता की थाली में क्या परोसा जा रहा है, इसकी जवाबदेही किसकी है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि विभाग की कार्रवाई का असर सिर्फ सैंपल की बोतल और सरकारी फाइल तक ही सीमित रह गया है, जबकि बाजार में खाद्य पदार्थों की बिक्री बदस्तूर जारी है?
जनता को सैंपलिंग का दिखावा नहीं, मिलावट से सुरक्षा चाहिए। साहब! मिठाई का सैंपल लेने के बाद रिपोर्ट आने तक इंतजार कौन करेगा—विभाग या वह आम आदमी, जिसकी सेहत पहले ही दांव पर लग चुकी है?


