पत्रकार दीपावली मिलन समारोह या सम्मान के नाम पर महत्व का खेल?

*आमंत्रण देकर घंटों इंतजार कराना, फिर पुलिस अधीक्षक की गैरमौजूदगी—आखिर यह पत्रकारों का सम्मान था या उपेक्षा?*
*पत्रकारों में मतभेद, प्रशासनिक संवाद में दूरी और सम्मान की परंपरा पर उठे सवाल।*
बेमेतरा – पत्रकारों के सम्मान, आपसी सौहार्द और पुलिस-प्रेस के बीच बेहतर समन्वय के उद्देश्य से आयोजित दीपावली मिलन समारोह अब जिले की पत्रकारिता में चर्चा और असंतोष का विषय बनता नजर आ रहा है। सवाल केवल पुलिस अधीक्षक की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि उस सोच और व्यवस्था का भी है, जहां आमंत्रण तो सभी को दिया जाता है, लेकिन सम्मान और महत्व के अनुभव में अंतर क्यों दिखाई देता है?
क्या पत्रकारों के बीच पहले से मौजूद मतभेद और संगठनात्मक दूरियां अब प्रशासनिक आयोजनों में भी अपनी छाया दिखाने लगी हैं?
*”मंच पर दीप जलते रहे, दिलों में अंधेरा रह गया,*
*सम्मान का पैगाम आया, मगर सवाल अधूरा रह गया।*
*जहां बराबरी की बात होनी थी, वहां भेद नजर आया,*
*मिलन के इस आयोजन ने आखिर दूरी का एहसास कराया।”*
*आमंत्रण मिला, इंतजार हुआ, लेकिन संवाद अधूरा रह गया!*
जानकारी के अनुसार, बेमेतरा जिले के कुछ पत्रकार संगठनों ने इस समारोह का बहिष्कार किया। वहीं, आमंत्रण स्वीकार कर कार्यक्रम में पहुंचे पत्रकारों को भी घंटों इंतजार के बाद पुलिस अधीक्षक की अनुपस्थिति खली। अंततः अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डॉ. हरीश यादव ने उपस्थित पत्रकारों का सम्मान कर दीपावली मिलन समारोह की औपचारिकता पूरी की। लेकिन सवाल यह है कि जिस अधिकारी के आमंत्रण पर पत्रकार पहुंचे थे, उनसे प्रत्यक्ष संवाद और मुलाकात की अपेक्षा रखना क्या अनुचित था? यदि पुलिस अधीक्षक किसी अपरिहार्य कारण से उपस्थित नहीं हो सके, तो क्या इसकी जानकारी समय रहते पत्रकारों को नहीं दी जा सकती थी?
*”किसी को मंच मिला, किसी को इंतजार मिला,*
*किसी को अपनापन, किसी को सवाल मिला।*
*कहने को तो सब पत्रकार एक समान हैं,*
*फिर सम्मान में किसे महत्व, किसे केवल नाम मिला?”*
पत्रकारों में मतभेद या सम्मान की परंपरा में असमानता?
एक ओर कुछ पत्रकार संगठनों ने बहिष्कार कर अपनी नाराजगी जाहिर की, तो दूसरी ओर आमंत्रण पर पहुंचे पत्रकारों ने भी पुलिस अधीक्षक की गैरमौजूदगी को अपनी उपेक्षा और अनादर के रूप में महसूस किया। यहां एक और गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या पत्रकारिता के भीतर आपसी मनमुटाव, संगठनात्मक प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिगत द्वेष और विचारों के मतभेद इतने गहरे हो चुके हैं कि सामूहिक सम्मान की भावना पीछे छूट रही है?
पत्रकार छोटा या बड़ा नहीं होता, हर व्यक्ति की अपनी लेखनी, अपनी पहचान और अपना स्वाभिमान होता है। फिर किसी को महत्व और किसी को कमतर समझने की मानसिकता आखिर क्यों?
*”कलम की कोई जात नहीं,* *न पत्रकारों का कद छोटा-बड़ा होता है,*
*सम्मान सबका बराबर हो, तभी लोकतंत्र खड़ा होता है।*
*द्वेष की दीवारें जब अपने ही खड़ी करते हैं,*
*तब बाहर वाले भी रिश्तों में दूरी भरते हैं।”*
पुलिस प्रशासन और पत्रकारिता के बीच संवाद जरूरी, लेकिन क्या संवाद में भी पक्षपात की गुंजाइश होनी चाहिए?
पुलिस प्रशासन और पत्रकारिता दोनों की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां हैं। पुलिस कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाती है, तो पत्रकार जनता की आवाज और व्यवस्था से जुड़े सवालों को सामने रखते हैं। दोनों के विचार अलग हो सकते हैं, सवालों पर मतभेद भी हो सकते हैं, लेकिन संवाद और सम्मान में भेदभाव नहीं होना चाहिए। क्या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं कि वह आलोचना करने वाले और प्रशंसा करने वाले, दोनों पत्रकारों के साथ समान व्यवहार करे? आखिर लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला पत्रकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना प्रशासन के कार्यों की सराहना करने वाला पत्रकार।
*”सवाल करने वालों से दूरी, तारीफ करने वालों से यारी,*
*क्या यही होनी चाहिए संवाद की जिम्मेदारी?*
*कलम अगर सच लिखे तो उसे सम्मान मिलना चाहिए,*
*न कि विचारों के अंतर पर किसी का मान घटाना चाहिए।”*
बहिष्कार करने वालों और उपस्थित पत्रकारों के बीच भी आत्ममंथन जरूरी!
इस पूरे घटनाक्रम में केवल पुलिस प्रशासन की भूमिका ही नहीं, बल्कि पत्रकार संगठनों के भीतर आपसी एकता और समान सम्मान की भावना भी विचारणीय है। यदि कुछ पत्रकारों ने बहिष्कार किया, तो उनके कारणों पर संवाद होना चाहिए था। वहीं, जो पत्रकार आमंत्रण स्वीकार कर पहुंचे, उनके समय और भावनाओं का भी सम्मान होना चाहिए था। क्या व्यक्तिगत मतभेद, संगठनात्मक वर्चस्व, आपसी प्रतिस्पर्धा और वैचारिक खींचतान पत्रकारिता की सामूहिक गरिमा से बड़ी हो सकती है? आखिर पत्रकारिता का उद्देश्य एक-दूसरे को नीचा दिखाना है या व्यवस्था के सामने जनहित के सवाल उठाना?
*”अपने ही जब अपने से नाराज हो जाते हैं,*
*तब दूसरों के लिए रास्ते आसान हो जाते हैं।*
*कपट, द्वेष और अहंकार से संगठन नहीं बनते,*
*एकता और समानता से ही सम्मान के दीप जलते हैं।”*
मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री तक पहुंच सकता है मामला!
इस पूरे घटनाक्रम की चर्चा अब मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री तक पहुंचाने की सुगबुगाहट भी सामने आ रही है। यदि ऐसा होता है तो यह केवल एक दीपावली मिलन समारोह का विषय नहीं रहेगा, बल्कि जिले में पुलिस और पत्रकारों के बीच संवाद, समन्वय तथा पारस्परिक सम्मान की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करेगा। क्या जिम्मेदार स्तर पर इस मामले को गंभीरता से लेकर सभी पत्रकार संगठनों और उपस्थित पत्रकारों के साथ संवाद की पहल की जाएगी?
*”शिकायतों से नहीं, संवाद से रास्ते निकलते हैं,*
*सम्मान के दीप तभी हर चौखट पर जलते हैं।*
*किसी एक की नाराजगी को पूरी जमात न समझिए,*
*हर कलम की आवाज को बराबर अहमियत दीजिए।”*
सम्मान केवल निमंत्रण पत्र से नहीं, व्यवहार से साबित होता है!
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। पुलिस और पत्रकारों के बीच स्वस्थ संबंधों का आधार आपसी विश्वास, निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवाद होना चाहिए। प्रशासन को पत्रकारों के सवालों से असहज होने के बजाय उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा समझना चाहिए। वहीं पत्रकार संगठनों को भी आपसी द्वेष, व्यक्तिगत स्वार्थ और पक्षपात से ऊपर उठकर एकजुटता की मिसाल पेश करनी चाहिए। क्योंकि जब सम्मान के नाम पर आयोजन हो और उसके बाद उपेक्षा, असमानता तथा मनमुटाव की चर्चा हो, तो आयोजन की मूल भावना पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
*”न कोई छोटा पत्रकार हो, न कोई बड़ा पत्रकार कहलाए,*
*हर कलम को उसकी निष्पक्ष पहचान के साथ सम्मान मिल पाए।*
*न पद का अहंकार हो, न संगठन का अभिमान,*
*संवाद में समानता हो, तभी बढ़ेगा पत्रकारिता का मान।”*
*आखिर सवाल वही है…*
आमंत्रण दिया था तो पुलिस अधीक्षक स्वयं उपस्थित क्यों नहीं हुए?
उपस्थित होना संभव नहीं था तो पत्रकारों को समय रहते सूचित क्यों नहीं किया गया?
कुछ पत्रकार संगठनों के बहिष्कार के पीछे आखिर क्या परिस्थितियां थीं?
आमंत्रित पत्रकारों के समय और स्वाभिमान का सम्मान सुनिश्चित करना आयोजकों की जिम्मेदारी नहीं थी?
क्या पत्रकारों के बीच आपसी मतभेद और प्रशासनिक संवाद में दूरी एक-दूसरे को और बढ़ावा दे रहे हैं?
क्या पुलिस प्रशासन और पत्रकारिता के बीच सम्मान का आधार व्यक्ति, संगठन और विचारधारा के बजाय समानता होना चाहिए?
क्योंकि पत्रकार छोटा-बड़ा नहीं होता, हर पत्रकार की अपनी लेखनी, अपनी जिम्मेदारी और अपना एक सम्मान होता है।
सम्मान का अर्थ केवल मंच पर माला पहनाना नहीं, बल्कि विचारों के मतभेद के बावजूद सबको समान महत्व देना है। यदि दीपावली मिलन का उद्देश्य दिलों की दूरी मिटाना था, तो क्या इस आयोजन के बाद दूरियां कम हुईं या सवाल और गहरे हो गए?
*खबर का निष्कर्ष*
दीपावली के दीप केवल घरों को नहीं, विचारों को भी रोशन करें। पुलिस प्रशासन और पत्रकारिता के बीच संवाद का रिश्ता पद, पसंद, संगठन या व्यक्तिगत समीकरणों पर नहीं, बल्कि निष्पक्षता और समान सम्मान पर आधारित होना चाहिए। वरना सम्मान समारोह होते रहेंगे, निमंत्रण बंटते रहेंगे, लेकिन आपसी विश्वास और सौहार्द की रोशनी कहीं पीछे छूटती जाएगी।


